आगरा। चिकित्सा जगत में तकनीक और डॉक्टरों की संवेदनशीलता जब एक साथ मिलती है, तो चमत्कार होते हैं। ऐसा ही एक बड़ा चमत्कार आगरा के सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज (SN Medical College) में देखने को मिला है। यहाँ के सुपर स्पेशियलिटी विभाग के डॉक्टरों ने सूझबूझ और आधुनिक चिकित्सा पद्धति का परिचय देते हुए एक 60 वर्षीय बुजुर्ग महिला को अपाहिज होने से बचा लिया। गंभीर रूप से मधुमेह (डायबिटीज) से पीड़ित इस महिला के पैर की धमनियां पूरी तरह ब्लॉक हो चुकी थीं, जिसके बाद डॉक्टरों ने एक बेहद जटिल और संवेदनशील स्टेंटिंग प्रक्रिया के जरिए उनके पैर में रक्त संचार को दोबारा बहाल करने में सफलता हासिल की है।

​सबसे राहत की बात यह है कि इस बेहद खर्चीले और जटिल इलाज के लिए गरीब मरीज के परिवार को एक भी पैसा खर्च नहीं करना पड़ा। उत्तर प्रदेश सरकार की ‘असाध्य रोग योजना’ के तहत यह पूरा इलाज पूरी तरह से नि:शुल्क किया गया।

​क्या थी मरीज की स्थिति और क्यों बढ़ गई थी डॉक्टरों की चुनौती?

​अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार, जब 60 वर्षीय महिला मरीज को एसएन मेडिकल कॉलेज लाया गया, तब उसकी स्थिति अत्यंत नाजुक थी। महिला असहनीय दर्द से तड़प रही थी और उसके पैर बेजान हो चुके थे। डॉक्टरों ने जब गहन जांच की, तो पता चला कि महिला ‘एक्यूट लिम्ब इस्कीमिया’ (Acute Limb Ischemia) नाम की एक बेहद गंभीर बीमारी की चपेट में थी।

​इस बीमारी में पैरों तक शुद्ध खून पहुंचाने वाली मुख्य धमनियों में थक्के जम जाते हैं या वे पूरी तरह ब्लॉक हो जाती हैं। यदि समय रहते इसका इलाज न मिले, तो पैर के ऊतक (Tissues) सड़ने लगते हैं जिसे मेडिकल भाषा में ‘गैंग्रीन’ कहा जाता है। ऐसी स्थिति में मरीज की जान बचाने के लिए अंग को काटना (Amputation) ही एकमात्र रास्ता बचता है।

चुनौती का दूसरा पहलू: डॉक्टरों के लिए यह मामला इसलिए भी इमोशनल और चुनौतीपूर्ण था क्योंकि कुछ साल पहले इसी बीमारी के कारण इस बुजुर्ग महिला का एक हाथ पहले ही काटना पड़ा चुका था। अगर इस बार पैर भी काट दिया जाता, तो महिला पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाती।

​पॉपलीटियल और एंटीरियर टिबियल धमनियों में था 100% ब्लॉकेज

​मरीज की एंजियोग्राफी और अन्य जांचों में यह साफ हो गया कि पैर की मुख्य नसें— पॉपलीटियल (Popliteal) और एंटीरियर टिबियल (Anterior Tibial) धमनियां पूरी तरह से बंद थीं। पैर में खून का कतरा भी नहीं पहुंच रहा था। समय तेजी से निकल रहा था और डॉक्टरों के पास फैसला लेने के लिए बहुत कम वक्त था।

​मधुमेह के मरीजों में वैसे भी घाव भरने की रफ्तार बहुत धीमी होती है, इसलिए पारंपरिक सर्जरी की जगह कुछ ऐसा करने की जरूरत थी जो न्यूनतम चीर-फाड़ वाली हो और जिससे मरीज को तुरंत राहत मिले।

​डॉ. हिमांशु यादव और टीम ने एंडोवैस्कुलर तकनीक से किया ‘मेडिकल मिरेकल’

​इस बेहद जटिल और जोखिम भरे मामले की कमान संभाली एसएन मेडिकल कॉलेज के जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. हिमांशु यादव और उनकी विशेषज्ञ टीम ने। डॉक्टर यादव ने पारंपरिक ओपन सर्जरी के बजाय अत्याधुनिक एंडोवैस्कुलर (Endovascular) प्रक्रिया को चुना।

डॉक्टरों ने बिना कोई बड़ा चीरा लगाए, पैर की बंद धमनियों के अंदर एक बेहद बारीक तार और कैथेटर की मदद से रास्ता बनाया। इसके बाद, अत्याधुनिक स्टेंट को उस ब्लॉकेज वाली जगह पर सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित (Deploy) कर दिया गया। स्टेंट खुलते ही बंद नसों में खून का प्रवाह फिर से तेजी से दौड़ने लगा। डॉक्टरों की इस सूझबूझ से महिला का पैर पूरी तरह सुरक्षित हो गया और वह अब तेजी से रिकवर कर रही हैं।

​’असाध्य रोग योजना’ बनी गरीब परिवार का सहारा

​इस सफल ऑपरेशन की गूंज पूरे मेडिकल कॉलेज में है। एस.एन. मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एवं डीन डॉ. प्रशांत गुप्ता ने डॉक्टरों की इस शानदार टीम को बधाई दी। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि यह मामला सिर्फ एक चिकित्सा क्षेत्र की कामयाबी नहीं है, बल्कि यह सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाओं की सफलता का भी प्रतीक है।

​प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता ने बताया:

​संस्थान का मुख्य लक्ष्य समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सुपर स्पेशियलिटी स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है।

​मरीज का परिवार बेहद गरीब पृष्ठभूमि से आता है, जो प्राइवेट अस्पताल में लाखों का खर्च उठाने में सक्षम नहीं था।

​प्रदेश सरकार की ‘असाध्य रोग योजना’ के तहत इस पूरी जटिल स्टेंटिंग प्रक्रिया को बिना कोई शुल्क लिए अंजाम दिया गया।

​दवाइयों से लेकर स्टेंट तक का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन किया गया।