आगरा, जिसे ताजनगरी के नाम से जाना जाता है, वहां इन दिनों प्यास बुझाने वाले विभाग ‘जलकल’ में भ्रष्टाचार की तपिश महसूस की जा रही है। शहर की प्यास बुझाने के लिए आने वाला सरकारी पैसा क्या कुछ रसूखदार अधिकारियों की जेबों में जा रहा है? यह सवाल तब और गहरा गया जब नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल ने जलकल विभाग के महाप्रबंधक (GM) अरुणेंद्र कुमार राजपूत के वित्तीय अधिकारों को सीज करने के लिए शासन को पत्र लिख दिया।

​नगर आयुक्त की सख्ती: क्या रडार पर हैं महाप्रबंधक?

​नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल की इस कार्रवाई ने नगर निगम और जलकल विभाग के गलियारों में खलबली मचा दी है। सूत्रों की मानें तो जलकल विभाग में लंबे समय से चल रही ‘भीतरी सेटिंग’ और अनियमितताओं की खबरें नगर आयुक्त की मेज तक पहुंच रही थीं। रिपोर्ट के अनुसार, महाप्रबंधक पर लगे आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उनके वित्तीय अधिकारों पर कैंची चलाने की संस्तुति शासन को भेजी गई है। यह कदम न केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई है, बल्कि उन सफेदपोशों के लिए चेतावनी भी है जो जनता के टैक्स के पैसे को अपनी जागीर समझने लगे थे।

​पाइपलाइन लीकेज और नई लाइनों के नाम पर ‘खेल’

​आरोप है कि जलकल विभाग में पाइपलाइन की मरम्मत और नई लाइन बिछाने के नाम पर एक बड़ा ‘कागजी खेल’ खेला गया। सूत्रों का कहना है कि:

  • ​ऐसी जगहों पर लीकेज और मरम्मत का खर्च दिखाया गया, जहां काम की जरूरत ही नहीं थी।
  • ​नई लाइन बिछाने के प्रोजेक्ट्स में बजट को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया।
  • ​घटिया सामग्री के इस्तेमाल और पुराने सामान को ही नया दिखाकर भुगतान करने के संदिग्ध मामले सामने आए हैं।

​यह घोटाला कोई चंद हजार का नहीं, बल्कि इसमें करोड़ों रुपयों की बंदरबांट की आशंका जताई जा रही है। हैरानी की बात यह है कि जब शहर के कई हिस्सों में लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे थे, तब विभाग के कुछ अधिकारी फाइलों में ‘पानी की तरह पैसा’ बहा रहे थे।

​रहस्यमय तरीके से फाइलों का गायब होना: क्या सबूत मिटाए जा रहे हैं?

​इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब जांच शुरू होने की सुगबुगाहट होते ही विभाग की महत्वपूर्ण फाइलें ‘गायब’ होने लगीं। इसे संयोग कहें या सोची-समझी साजिश, लेकिन जैसे ही नगर आयुक्त ने रिकॉर्ड तलब किए, कई अहम दस्तावेज रिकॉर्ड रूम से नदारद पाए गए।

​जानकारों का कहना है कि फाइलों का गायब होना इस बात का पुख्ता संकेत है कि अंदरखाने कुछ ऐसा है जिसे दबाने की कोशिश की जा रही है। जांच में बाधा डालने और सबूतों को नष्ट करने के इन प्रयासों ने महाप्रबंधक अरुणेंद्र कुमार राजपूत की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है।

जांच से दूरी और फाइलों पर ‘कुंडली’: जब टीम के सामने भी नहीं आए अधिकारी​

भ्रष्टाचार के आरोपों की परतें खोलने के लिए जब नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल ने कड़े कदम उठाए, तो विभाग के भीतर से ही असहयोग की दीवारें खड़ी कर दी गईं। शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए नगर आयुक्त ने अपर नगर आयुक्त शिशिर कुमार की अध्यक्षता में एक चार सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन किया था।​

हैरानी की बात यह है कि जिस अधिकारी पर विभाग की सुचारू कार्यप्रणाली का जिम्मा था, उन्होंने ही जांच में ‘रोड़े’ अटकाने शुरू कर दिए। जांच समिति ने कई बार संबंधित फाइलें और दस्तावेज मांगे, लेकिन सूत्र बताते हैं कि महाप्रबंधक कार्यालय से कोई सहयोग नहीं मिला। इतना ही नहीं, महाप्रबंधक ने जांच टीम के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने से भी किनारा कर लिया।

​प्रशासनिक मर्यादा की अनदेखी?

जब जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी जांच समितियों के सामने पेश होने से इनकार करते हैं, तो संदेह की सुई और गहरी हो जाती है। अंततः, समिति ने उपलब्ध साक्ष्यों और विभाग में मौजूद अन्य रिकॉर्ड्स के आधार पर अपनी रिपोर्ट नगर आयुक्त को सौंपी। इसी रिपोर्ट में महाप्रबंधक के ‘अड़ियल रुख’ और ‘साक्ष्यों को छिपाने’ की कोशिशों का जिक्र किया गया, जिसके बाद नगर आयुक्त ने कड़ा फैसला लेते हुए उनके वित्तीय अधिकार सीज करने के लिए शासन को पत्र लिख दिया।

​शासन की दहलीज पर मामला: अब क्या होगा अगला कदम?

​नगर आयुक्त की संस्तुति अब उत्तर प्रदेश शासन के पाले में है। यदि शासन इस रिपोर्ट पर अपनी मुहर लगा देता है, तो महाप्रबंधक के पास कोई भी बजट पास करने या भुगतान करने का अधिकार नहीं रहेगा। यह एक तरह से विभाग में उनके कार्यकाल का ‘प्रशासनिक अंत’ माना जा सकता है।

​फिलहाल, विभाग के अन्य अधिकारी और कर्मचारी इस कार्रवाई से सहमे हुए हैं। दबी जुबान में चर्चा है कि यदि निष्पक्ष जांच हुई, तो कई बड़े नाम इस घोटाले की चपेट में आएंगे। हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि महाप्रबंधक अरुणेंद्र कुमार राजपूत का पक्ष अभी आधिकारिक रूप से सामने नहीं आया है। पत्रकारिता के सिद्धांतों के तहत, उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है, और उनकी प्रतिक्रिया आने पर उसे भी प्रमुखता दी जाएगी।

आगरा जलकल विभाग का यह मामला केवल एक वित्तीय अनियमितता नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक सेवा में जवाबदेही की कमी का प्रतीक है। जब एक जिम्मेदार पद पर बैठा अधिकारी जांच के घेरे में आता है, तो पूरे विभाग की विश्वसनीयता दांव पर लग जाती है। नगर आयुक्त की यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के खिलाफ एक “सर्जिकल स्ट्राइक” साबित होगी या फिर लालफीताशाही की फाइलों में दबकर रह जाएगी, यह तो वक्त ही बताएगा।