
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति और नौकरशाही के बीच ‘प्रोटोकॉल’ की जंग एक बार फिर सुर्खियों में है। लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि (सांसद और विधायक) सर्वोपरि होते हैं, लेकिन यूपी की ब्यूरोक्रेसी में स्थिति कुछ अलग ही नजर आ रही है। आलम यह है कि पिछले 10 वर्षों में 15 बार शासनादेश जारी होने के बावजूद, अधिकारी माननीयों का फोन उठाना तो दूर, उन्हें उचित सम्मान देना भी जरूरी नहीं समझ रहे हैं।
अब इस मामले में शासन ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव संसदीय कार्य की ओर से नए निर्देश जारी किए गए हैं, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों पर अब ‘यूपी राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली’ के तहत गाज गिरेगी।
क्या है नया शासनादेश और अफसरों के लिए नई गाइडलाइंस?
उत्तर प्रदेश सरकार ने अधिकारियों के लिए एक ‘शिष्टाचार चार्ट’ जारी किया है। नए निर्देशों के अनुसार, अब किसी भी आईएएस (IAS), आईपीएस (IPS) या अन्य विभागीय अधिकारी के कार्यालय में यदि कोई सांसद या विधायक आता है, तो अधिकारी को अपनी सीट से उठकर उनका अभिवादन करना होगा।
केवल अभिवादन ही नहीं, बल्कि ‘माननीयों’ के बैठने के बाद उनसे पानी के लिए पूछना और उनकी बात को पूरी गंभीरता से सुनना अब अफसरों की जिम्मेदारी होगी। इसे केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि अनिवार्य ड्यूटी का हिस्सा माना गया है।
फोन कॉल का जवाब देना अब मजबूरी, ‘कॉल बैक’ करना होगा जरूरी
अक्सर जनप्रतिनिधियों की यह शिकायत रहती है कि जिले के बड़े अधिकारी उनका फोन नहीं उठाते। इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए शासन ने निर्देश दिया है कि अधिकारी सभी माननीयों के नंबर अपने मोबाइल में सेव करें।
- अनिवार्य कॉल रिसीविंग: अधिकारियों को हर हाल में जनप्रतिनिधियों का फोन उठाना होगा।
- मीटिंग का बहाना नहीं चलेगा: यदि अधिकारी किसी महत्वपूर्ण बैठक में व्यस्त हैं और फोन नहीं उठा पाते हैं, तो मीटिंग खत्म होते ही उन्हें अनिवार्य रूप से ‘कॉल बैक’ करना होगा।
- समस्या का समाधान: फोन पर केवल बात करना काफी नहीं होगा, बल्कि जनप्रतिनिधि द्वारा बताई गई जनहित की समस्या का त्वरित समाधान भी सुनिश्चित करना होगा।
10 साल में 15 बार आदेश, फिर भी क्यों बेअसर रही व्यवस्था?
हैरानी की बात यह है कि पिछले एक दशक में इसी तरह के करीब 15 शासनादेश जारी किए जा चुके हैं। हाल ही में विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान भी यह मुद्दा गरमाया था। कई विधायकों ने सदन में अपनी व्यथा सुनाई थी कि अधिकारी उनकी बातों को अनसुना कर देते हैं।
विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने भी इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी और अधिकारियों को हिदायत दी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि आदेश तो बार-बार जारी होते हैं, लेकिन जब तक किसी बड़े अधिकारी पर इस मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई का उदाहरण पेश नहीं किया जाता, तब तक जमीनी स्तर पर बदलाव आना मुश्किल है।
ब्यूरोक्रेसी बनाम लोकतंत्र: क्यों जरूरी है यह प्रोटोकॉल?
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सांसद और विधायक लाखों लोगों की आवाज होते हैं। जब एक अधिकारी उनका फोन नहीं उठाता, तो असल में वह उस क्षेत्र की जनता की समस्याओं को अनसुना कर रहा होता है। शासन का मानना है कि अधिकारियों का यह अड़ियल रवैया सरकार की छवि को भी धूमिल करता है।
प्रमुख सचिव द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि पुराने निर्देशों की अवहेलना यह दर्शाती है कि कुछ अधिकारी शासन के आदेशों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। अब इसे सीधे तौर पर ‘आचरण नियमावली’ का उल्लंघन माना जाएगा, जिसके तहत सस्पेंशन या विभागीय जांच जैसी कठोर कार्रवाई हो सकती है।
हाथ जोड़कर स्वागत और पानी पूछना: क्या बदलेगी अफसरों की कार्यशैली?
नए आदेशों में ‘सॉफ्ट स्किल्स’ पर काफी जोर दिया गया है। हाथ जोड़कर स्वागत करना, सम्मानपूर्वक विदा करना और जनहित के कार्यों में सहयोग करना—ये कुछ ऐसे बिंदु हैं जो यह बताते हैं कि शासन अब ब्यूरोक्रेसी के ‘अभिमान’ को कम कर उसे ‘जनसेवा’ की ओर मोड़ना चाहता है।
लेकिन सवाल वही बना हुआ है: क्या महज एक और शासनादेश से अफसरों का रवैया बदलेगा? लखनऊ के गलियारों में चर्चा है कि इस बार शासन ‘हंटर’ चलाने के मूड में है। यदि किसी माननीय ने लिखित शिकायत की और वह सही पाई गई, तो अधिकारी को स्पष्टीकरण देना भारी पड़ सकता है।



