आगरा। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर काम कर रही है, और इसका ताजा उदाहरण ताजनगरी आगरा में देखने को मिला है। शहर की प्यास बुझाने की जिम्मेदारी संभालने वाले जलकल विभाग में पाइपलाइन बिछाने और मरम्मत के नाम पर हुए करोड़ों रुपये के बंदरबांट पर शासन ने कड़ा प्रहार किया है। भ्रष्टाचार और जांच में अड़ंगा डालने के गंभीर आरोपों के चलते विभाग के महाप्रबंधक (GM) अरुणेंद्र कुमार राजपूत को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।

​प्रमुख सचिव (नगर विकास विभाग) पी. गुरु प्रसाद द्वारा गुरुवार को जारी किए गए इस आदेश ने विभाग के भीतर हड़कंप मचा दिया है। यह कार्रवाई उस वक्त हुई जब महज 24 घंटे पहले ही नगरायुक्त अंकित खंडेलवाल ने जीएम के वित्तीय अधिकार सीज करते हुए शासन को सख्त कार्रवाई के लिए पत्र लिखा था।

​पाइपलाइन की मरम्मत के नाम पर 4.30 करोड़ का ‘गोलमाल’

​यह पूरा मामला दिसंबर 2025 से चर्चा में था। आगरा शहर में बिछी लगभग 1600 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन की मरम्मत और नई लाइनें डालने के लिए करोड़ों का बजट आवंटित किया गया था। आरोप है कि इस बजट का बड़ा हिस्सा धरातल पर काम करने के बजाय कागजों पर ही ठिकाने लगा दिया गया। शुरुआती जांच में लगभग 4.30 करोड़ रुपये के वित्तीय गबन की पुष्टि हुई है।

​हैरानी की बात यह है कि जब इस संबंध में शिकायतें विभाग के पास पहुंचीं, तो महाप्रबंधक अरुणेंद्र राजपूत ने इन्हें गंभीरता से लेने के बजाय शिकायतों को ‘फर्जी’ बताकर खारिज कर दिया। उनकी इस कार्यप्रणाली ने प्रशासन के संदेह को और पुख्ता कर दिया।

​जांच समिति को गुमराह करने और फाइलें छिपाने का आरोप

​भ्रष्टाचार की गूंज जब लखनऊ तक पहुंची, तो नगरायुक्त अंकित खंडेलवाल ने अपर नगरायुक्त शिशिर कुमार की निगरानी में एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की। हालांकि, जांच टीम को कदम-कदम पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार, निलंबित जीएम ने जांच में सहयोग करने के बजाय साक्ष्यों को मिटाने और महत्वपूर्ण फाइलें छिपाने की कोशिश की। विभागीय कर्मचारियों को बचाने के लिए फाइलों को दबाया गया ताकि गबन की परतें न खुल सकें।

​रेन वॉटर हार्वेस्टिंग और स्लूज वाल्व खरीद में भी सेंधमारी

​जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में भ्रष्टाचार के कई और काले अध्याय खोले हैं:

  • रेन वॉटर हार्वेस्टिंग: शहर के जलस्तर को सुधारने के लिए चलाई गई परियोजनाओं में करीब 2.5 करोड़ रुपये का गोलमाल पाया गया है।
  • स्लूज वाल्व खरीद: लखनऊ की कुछ खास कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए 80 लाख रुपये के स्लूज वाल्व की खरीद में नियमों को ताक पर रखा गया।
  • अवैध पदोन्नति और नियुक्तियां: नियमों की अनदेखी का आलम यह था कि परीक्षा फेल करने वाले लिपिकों को पदोन्नत कर दिया गया। इतना ही नहीं, एक मृतक आश्रित को बिना जरूरी योग्यता के सीधे जूनियर इंजीनियर (JE) के पद पर तैनात कर दिया गया, जो सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन है।

​प्रशासन का सख्त रुख: अब आगे क्या?

​नगरायुक्त की सिफारिश पर शासन ने त्वरित संज्ञान लिया और दोषी अधिकारी को कुर्सी से हटा दिया। आदेश के अनुसार, जब तक स्थायी महाप्रबंधक की नियुक्ति नहीं हो जाती, तब तक संघ भूषण को कार्यवाहक चार्ज सौंपा गया है।

​विशेषज्ञों का मानना है कि यह तो अभी शुरुआत है। जिस तरह से फाइलों को गायब करने और नियुक्तियों में फर्जीवाड़ा हुआ है, उससे विभाग के कई अन्य बड़े अधिकारियों और ठेकेदारों पर भी गिरफ्तारी और कार्रवाई की तलवार लटक रही है।

​आगरा जलकल विभाग का यह प्रकरण सरकारी तंत्र में बैठे उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो विकास कार्यों के पैसे को अपनी तिजोरी भरने का जरिया समझते हैं। जनता के टैक्स के पैसे से होने वाली जलापूर्ति व्यवस्था में इस तरह का भ्रष्टाचार न केवल शहर के विकास को रोकता है, बल्कि प्रशासन की छवि को भी धूमिल करता है।

पाठकों के लिए सवाल:

क्या आपको लगता है कि केवल निलंबन ही काफी है, या भ्रष्टाचार के माध्यम से गबन की गई पूरी राशि की वसूली दोषी अधिकारियों की संपत्ति कुर्क करके की जानी चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।