आगरा। उत्तर प्रदेश में नए शैक्षणिक सत्र की आहट के साथ ही निजी स्कूलों की मनमानी और अभिभावकों के शोषण का पुराना खेल फिर से शुरू हो गया है। किताबों, कॉपियों और स्कूल ड्रेस के नाम पर अभिभावकों की जेब काटने वाले ‘शिक्षा माफिया’ के खिलाफ अब आगरा प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स (टीम पापा) ने निर्णायक जंग का ऐलान कर दिया है।

​बुधवार को संस्था के पदाधिकारियों ने मण्डल आयुक्त श्री नागेंद्र प्रताप के माध्यम से प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संबोधित एक ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में सात प्रमुख मांगों के जरिए निजी स्कूलों और उनके साथ मिलीभगत करने वाले शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर नकेल कसने की अपील की गई है।

​”टास्कफोर्स मात्र दिखावा, भ्रष्टाचार में लिप्त हैं अधिकारी”

​टीम पापा के संरक्षक मनोज शर्मा ने तीखे शब्दों में विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “विभागीय टास्कफोर्स जमीनी स्तर पर काम करने के बजाय मात्र खानापूर्ति कर रही है। पूरे जनपद में सैकड़ों स्कूल नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर मात्र एक-दो स्कूलों पर नोटिस जारी कर इतिश्री कर ली जाती है। यह मिलीभगत का स्पष्ट प्रमाण है।”

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​मनोज शर्मा ने मांग की कि निजी स्कूलों में नियम विरुद्ध चल रही कमीशनखोरी और ब्रांडेड सामानों की अनिवार्यता को तत्काल बंद किया जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार को शिक्षा को ‘व्यापार’ बनने से रोककर उसे ‘सुलभ और सस्ता’ बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।

​किताबों और ड्रेस के नाम पर ‘लूट’ का संगठित ढांचा

​संस्था के अरुण मिश्रा ने बताया कि हर साल की तरह इस बार भी स्कूलों ने चुनिंदा दुकानों के साथ सेटिंग कर ली है। निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें और विशिष्ट लोगो वाली ड्रेस केवल उन्हीं दुकानों पर मिलती हैं जहाँ से स्कूलों को मोटा कमीशन मिलता है।

​अभिभावकों का आरोप है कि आईजीआरएस पोर्टल पर की गई शिकायतों को भी जिले के अधिकारी ‘स्पेशल क्लोज’ कर निस्तारित कर देते हैं, जबकि धरातल पर समस्या वैसी की वैसी ही बनी रहती है। अधिकारियों की इसी ‘लीपापोती’ की वजह से स्कूलों के हौसले बुलंद हैं।

​टीम पापा की वो 7 माँगें, जो बदल सकती हैं शिक्षा की तस्वीर

​अभिभावक संघ ने मुख्यमंत्री के सामने सात प्रमुख माँगें रखी हैं, जिन्हें लागू करने से मध्यमवर्गीय परिवारों को बड़ी राहत मिल सकती है:

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  1. वेबसाइट पर पारदर्शिता: जिन स्कूलों ने अपनी वेबसाइट पर किताबों की सूची और फीस स्ट्रक्चर सार्वजनिक नहीं किया है, उन पर तत्काल भारी जुर्माना लगाया जाए।
  2. दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई: जो शिक्षा अधिकारी शिकायतों पर केवल चेतावनी पत्र भेजकर शांत बैठ जाते हैं, उनकी भूमिका की निष्पक्ष जांच हो।
  3. निजी प्रकाशकों पर रोक: केवल एनसीईआरटी (NCERT) का पाठ्यक्रम अनिवार्य हो और कमीशन के चक्कर में निजी प्रकाशकों की किताबें थोपने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द हो।
  4. ड्रेस माफिया का अंत: स्कूलों के नाम और लोगो वाले जूते-कपड़े केवल चिन्हित दुकानों पर बेचने की प्रथा बंद हो। साधारण ड्रेस को बढ़ावा दिया जाए।
  5. विज्ञापन का जरिया न बनें बच्चे: स्कूल की मार्केटिंग के लिए बच्चों की टी-शर्ट, शर्ट के कॉलर और जूतों पर बड़े-बड़े लोगो लगाने पर प्रतिबंध लगे।
  6. ब्रांडेड सामान की बाध्यता खत्म हो: ऐसे ब्रांडेड जूते या आर्टिकल नंबर जो सामान्य बाजार में उपलब्ध न हों, उनकी बाध्यता को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए।
  7. 15% फीस वापसी का आदेश: माननीय उच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2020 की फीस में 15% छूट के आदेश का शत-प्रतिशत पालन कराया जाए, जिसका लाभ अभी तक अधिकांश अभिभावकों को नहीं मिला है।

​मुख्यमंत्री से मुलाकात न होने पर अब ‘लखनऊ कूच’ की तैयारी

​संस्था के दीपक वर्मा और प्रावीन सक्सेना ने साझा किया कि पूर्व में भी इस मुद्दे को लेकर उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और राज्य मंत्री संदीप सिंह से वार्ता की गई थी। आश्वासन तो मिले, लेकिन धरातल पर जिला स्तरीय शुल्क नियामक समिति की बैठकें मात्र औपचारिकता बनकर रह गई हैं।

​टीम पापा ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि इन न्यायसंगत मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं होती है, तो उत्तर प्रदेश के हजारों अभिभावक एकजुट होकर लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास या विधानसभा का घेराव करेंगे।

निष्कर्ष (Conclusion)

​शिक्षा समाज की नींव है, लेकिन जब यह केवल मुनाफाखोरी का जरिया बन जाए, तो अभिभावकों का सड़क पर उतरना लाजिमी है। टीम पापा द्वारा उठाए गए मुद्दे केवल आगरा के नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के हर उस अभिभावक के हैं जो अपने बच्चे के भविष्य के लिए अपनी जमा-पूंजी इन निजी स्कूलों के हवाले कर रहा है। अब देखना यह है कि प्रशासन इन ‘पापा’ की पुकार सुनता है या फिर भ्रष्टाचार की यह फाइलें ठंडे बस्ते में ही रहेंगी।

पाठकों के लिए प्रश्न (Engagement):

क्या आपके शहर के निजी स्कूल भी आपको विशिष्ट दुकानों से ही किताबें और ड्रेस खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।