
आगरा। ताजनगरी के नगर निगम में बीते कुछ दिनों से चल रहा ‘शीतयुद्ध’ अब खुलकर सामने आ गया है। आगरा की मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह और नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल के बीच का विवाद अब मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुँच चुका है। मेयर ने सीधे तौर पर नगर आयुक्त पर भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक शिकायती पत्र भेजा है। इस पत्र के बाद आगरा की सियासत में हलचल तेज हो गई है।
सदन की अवमानना और भ्रष्टाचार का लगा आरोप
मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह द्वारा मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाए गए हैं। मेयर का आरोप है कि नगर आयुक्त ने नगर निगम अधिनियम की धाराओं का गलत फायदा उठाते हुए अपने पसंदीदा ठेकेदारों को करोड़ों रुपये के काम सौंपे हैं।
शिकायती पत्र के अनुसार, इन कार्यों के लिए न तो पारदर्शिता बरती गई और न ही उचित प्रक्रिया का पालन किया गया। मेयर ने आरोप लगाया कि कई महत्वपूर्ण कार्य ‘ऑफलाइन टेंडर’ और ‘रेट लिस्ट’ के माध्यम से बिना किसी खुली प्रतिस्पर्धा के आवंटित किए गए, जिससे राजस्व का भारी नुकसान हुआ है।
”इतिहास का काला दिन”: जब सदन में नहीं पहुंचे अधिकारी
विवाद की सबसे बड़ी वजह सदन की बैठक में अधिकारियों की अनुपस्थिति रही। मेयर ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि सदन की बैठक के दौरान नगर आयुक्त और उनके अधीनस्थ अधिकारियों का शामिल न होना “नगर निगम के इतिहास का काला दिन” है। पार्षदों का आरोप है कि नगर आयुक्त ने जानबूझकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाया और अपनी जवाबदेही से बचने के लिए बैठक को बाधित करने की कोशिश की।
जवाब में, नगर आयुक्त ने तर्क दिया कि लोकसभा सत्र और विधानमंडलीय समिति की व्यस्तताओं के कारण वे उपस्थित नहीं हो सके। हालांकि, मेयर ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पिछले वर्ष भी मानसून सत्र के दौरान बैठकें हुई थीं, तो इस बार क्यों नहीं?
विकास कार्यों की अनदेखी से पार्षदों में भारी आक्रोश
आगरा के विभिन्न वार्डों के पार्षदों में भी प्रशासन के खिलाफ गुस्सा चरम पर है। पार्षदों का कहना है कि उनके क्षेत्रों में विकास कार्य पूरी तरह ठप पड़े हैं।
- 15वें वित्त आयोग के तहत प्रस्तावित विकास कार्यों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
- प्रत्येक वार्ड के लिए स्वीकृत 50-50 लाख रुपये के कार्यों के प्रस्ताव फाइलों में दबे हुए हैं।
- जनता मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है, लेकिन अधिकारी सुनवाई नहीं कर रहे हैं।
इसी आक्रोश के चलते सदन में नगर आयुक्त के खिलाफ ‘निंदा प्रस्ताव’ पारित किया गया, जिसे अब मुख्यमंत्री को भेजा गया है।
कर्मचारियों ने बांधी काली पट्टी, प्रशासन और जनप्रतिनिधि आमने-सामने

जहाँ एक तरफ मेयर और पार्षद लामबंद हैं, वहीं दूसरी तरफ नगर निगम के कर्मचारी और अधिकारी नगर आयुक्त के समर्थन में उतर आए हैं। निगम के चपरासी से लेकर क्लर्क और बड़े अधिकारियों ने हाथों पर काली पट्टी बांधकर काम किया। कर्मचारियों का तर्क है कि सदन में जिस तरह का व्यवहार और निंदा प्रस्ताव लाया गया, वह अनुचित है। इस विरोध प्रदर्शन ने नगर निगम के भीतर एक गहरी खाई पैदा कर दी है, जिससे कामकाज प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
नगर आयुक्त का पक्ष: “बजट पास होना प्राथमिकता”
इस पूरे विवाद पर नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल ने अपनी सफाई पेश की है। उनका कहना है कि कार्यालय की ओर से बैठक को लेकर कोई स्पष्ट लिखित निर्देश प्राप्त नहीं हुए थे। उन्होंने कहा कि उनका मुख्य ध्यान शहर के विकास के लिए वर्ष 2025-26 का बजट पास कराने पर है। खंडेलवाल के अनुसार, “संसद के बजट सत्र और अन्य संवैधानिक व्यवस्थाओं के चलते बैठक पर रोक की स्थिति थी। हमने मेयर को पत्र लिखकर निर्देश मांगे थे, लेकिन हमें कोई जवाब नहीं मिला।”
निष्कर्ष
आगरा नगर निगम का यह विवाद अब केवल प्रशासनिक नहीं रह गया है, बल्कि इसने एक बड़े राजनीतिक संकट का रूप ले लिया है। एक तरफ जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं जो जवाबदेही मांग रहे हैं, और दूसरी तरफ प्रशासनिक मशीनरी है जो नियमों का हवाला दे रही है। अब सबकी नजरें लखनऊ पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस भ्रष्टाचार की शिकायत और आपसी टकराव पर क्या कड़ा फैसला लेते हैं।
पाठकों के लिए प्रश्न: क्या आपको लगता है कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच का यह आपसी टकराव शहर के विकास कार्यों में बाधा बन रहा है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।



