
आगरा। एक पिता जब अपने बच्चे के सुनहरे भविष्य का सपना देखता है, तो उसकी आंखों में चमक होती है। लेकिन जब वही पिता नए सत्र की शुरुआत में किताबों की दुकान के बाहर लंबी कतार में खड़ा होता है, तो वह चमक डर और चिंता में बदल जाती है। यह डर भविष्य का नहीं, बल्कि वर्तमान की उस ‘लूट’ का है, जो शिक्षा के पवित्र मंदिर की आड़ में सरेआम हो रही है। आज किताबों की कीमतें आसमान छू रही हैं और कॉपियों के पन्नों में भी मुनाफाखोरी का काला खेल खेला जा रहा है।
सपनों पर भारी पड़ता ‘बुक सेट’ का बिल
नए सत्र की आहट के साथ ही मध्यमवर्गीय परिवारों के घरों का बजट चरमरा गया है। एक तरफ रसोई की बढ़ती महंगाई है और दूसरी तरफ निजी स्कूलों की तरफ से थोपा गया भारी-भरकम पाठ्यक्रम। कक्षा 6 के एक छोटे से बच्चे के बस्ते में आज 18-18 किताबें भरी जा रही हैं। जिस उम्र में बच्चे को खेल-कूद और बुनियादी ज्ञान की जरूरत है, उसे कंप्यूटर कोडिंग, प्रोग्रामिंग और तीन-तीन भाषाओं के बोझ तले दबाया जा रहा है।
हैरानी की बात यह है कि जहाँ केंद्रीय विद्यालयों में एक ही किताब से संपूर्ण विषय पढ़ाया जाता है, वहीं निजी स्कूलों में विज्ञान को फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी की अलग-अलग किताबों में बांट दिया गया है। अंग्रेजी के लिए साहित्य और व्याकरण के साथ-साथ अब अलग से ‘नॉवेल’ भी अनिवार्य कर दिए गए हैं। क्या यह वाकई ज्ञान बढ़ाने की कोशिश है या प्रकाशकों के साथ मिलकर जेब भरने की साजिश?
कॉपियों के पन्नों में छिपा ‘कालाबाजारी’ का खेल
अभिभावकों पर दोहरी मार केवल किताबों से नहीं, बल्कि कॉपियों के नाम पर भी पड़ रही है। हाल ही में शहर के एक प्रतिष्ठित ‘माहेश्वरी बुक डिपो’ से किताब-कॉपियां खरीदने वाले अभिभावकों ने जो खुलासा किया, वह चौंकाने वाला है। 200 पेज की जिस कॉपी के लिए अभिभावकों से 90 रुपये वसूले गए, घर जाकर जब उसकी रेट स्लिप हटाई गई, तो सच्चाई कुछ और ही निकली। स्लिप के नीचे असल मूल्य 70 रुपये और पन्नों की संख्या मात्र 164 अंकित थी। यह सिर्फ 20 रुपये का अंतर नहीं है, यह हजारों अभिभावकों के भरोसे के साथ सरेआम धोखा है।
जिलाधिकारी की सख्त कार्रवाई: सेंट पैट्रिक्स स्कूल पर 5 लाख का जुर्माना
अभिभावकों के इस बढ़ते आक्रोश और आईजीआरएस (IGRS) पर मिली शिकायतों का संज्ञान लेते हुए आगरा के जिलाधिकारी अरविंद मल्लप्पा बंगारी ने कड़ा रुख अपनाया है। जिलाधिकारी ने निजी स्कूलों की मनमानी और बिना अनुमति पाठ्यक्रम बदलने के मामले में ‘सेंट पैट्रिक्स स्कूल’ पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाने का निर्देश दिया है।
बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) जितेंद्र कुमार गोंड ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई भी स्कूल बिना विभाग की स्वीकृति के किताबें या पाठ्यक्रम बदलता है, तो उसे भारी जुर्माना भुगतना होगा। प्रशासन की इस कार्रवाई ने उन स्कूलों और विक्रेताओं को कड़ा संदेश दिया है जो शिक्षा को पूरी तरह व्यापार बना चुके हैं।
कमीशन का खेल और अभिभावकों की मजबूरी
बाजार का नियम है कि थोक में सामान लेने पर छूट मिलती है, लेकिन शिक्षा के इस बाजार में नियम उलटे हैं। सामान्य दुकानों पर जो किताबें 15 से 25 प्रतिशत की छूट पर मिल सकती हैं, स्कूलों द्वारा ‘चिह्नित’ दुकानों पर उन्हें एमआरपी (MRP) पर बेचना अनिवार्य कर दिया गया है। स्थिति यहाँ तक भयावह है कि यदि कोई अभिभावक केवल किताबें लेना चाहे और कॉपियां बाजार से खरीदना चाहे, तो दुकानदार उन्हें किताबें देने से ही इनकार कर देते हैं। एक ही वेंडर से पूरा सेट खरीदने की यह मजबूरी सीधे तौर पर अभिभावकों की जेब पर डाका डालने जैसा है।
क्या शिक्षा केवल अमीरों का विशेषाधिकार है?
कोविड के बाद से आर्थिक रूप से टूटे हुए परिवारों के लिए हर साल नए बुक सेट खरीदना किसी सजा से कम नहीं है। अभिभावकों का सवाल वाजिब है—”हर साल किताबें क्यों बदली जाती हैं? क्या एक साल पुरानी किताब से ज्ञान कम हो जाता है?” यदि किताबें नहीं बदली जाएं, तो गरीब और मध्यमवर्गीय बच्चे पुरानी किताबों से भी अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं। लेकिन ‘अपडेटेड एडिशन’ के नाम पर हर साल पन्नों को इधर-उधर कर नया दाम चस्पा कर दिया जाता है।
निष्कर्ष
शिक्षा का उद्देश्य समाज को दिशा देना था, लेकिन वर्तमान स्थिति देखकर लगता है कि यह केवल मुनाफा कमाने का जरिया बनकर रह गई है। प्रशासन की कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन क्या केवल एक स्कूल पर जुर्माना लगाने से यह पूरी व्यवस्था सुधर जाएगी? जब तक स्कूल, प्रकाशक और पुस्तक विक्रेताओं के इस त्रिकोणीय गठजोड़ को नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक एक पिता अपनी मेहनत की कमाई को ‘बुक सेट’ के नाम पर लुटते हुए देखने को मजबूर रहेगा।
पाठकों के लिए सवाल:
क्या आपको भी लगता है कि स्कूलों को हर साल किताबें बदलने के बजाय कम से कम 3 साल तक एक ही पाठ्यक्रम चलाने का नियम बनाना चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।



