आगरा। ताजनगरी के नगर निगम गलियारों में इन दिनों सियासी पारा सातवें आसमान पर है। शहर की सरकार यानी नगर निगम में मेयर और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच का अंतर्विरोध अब खुलकर सड़कों और फाइलों पर आ गया है। सोमवार की सुबह 11 बजे बुलाई गई सदन की बैठक को लेकर मचे घमासान ने यह साफ कर दिया है कि नगर निगम प्रशासन और जन प्रतिनिधियों के बीच ‘तालमेल’ की भारी कमी है। स्थिति यह है कि बैठक की घोषणा तो हो गई, लेकिन पार्षदों के पास न तो सूचना पहुंची और न ही बैठक का कोई एजेंडा तैयार किया गया।

​. बिना एजेंडे के बैठक: नियमों की उलझन या आपसी खींचतान?

​विवाद की शुरुआत तब हुई जब मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह ने सोमवार (23 मार्च) को सुबह 11 बजे सदन की सामान्य बैठक बुलाने के निर्देश जारी किए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सदन की बैठक शहर के विकास के लिए अनिवार्य है, लेकिन यहां पेच यह फंसा कि नगर निगम सचिवालय ने इस बैठक का एजेंडा ही जारी नहीं किया। नियमानुसार, किसी भी सदन की बैठक से पूर्व पार्षदों को एजेंडा भेजा जाना आवश्यक होता है ताकि वे वार्ड की समस्याओं पर तैयारी के साथ आ सकें। सचिवालय की इस चुप्पी को मेयर के आदेशों की अनदेखी के तौर पर देखा जा रहा है।

​. शासनादेश का हवाला और अधिकारियों के अपने तर्क

​नगर निगम के अधिकारी इस समय ‘बैकफुट’ पर जाने के बजाय नियमों की ढाल का सहारा ले रहे हैं। अधिकारियों का तर्क है कि जब लोकसभा या विधानसभा का सत्र चल रहा हो, तो नगर निगम सदन की बैठकें आयोजित नहीं की जानी चाहिए। वर्तमान में संसद का बजट सत्र 9 मार्च से 2 अप्रैल तक प्रस्तावित है। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे समय में उन बैठकों से बचना चाहिए जिनमें सांसद या विधायक सदस्य के रूप में नामित हों, क्योंकि उनकी उपस्थिति अनिवार्य होती है और वे दिल्ली या लखनऊ में व्यस्त हो सकते हैं।

​. बजट 2025-26: विकास कार्यों पर लटकी तलवार

​अधिकारियों ने 13 मार्च को एक विस्तृत नोटिंग प्रस्तुत की थी, जिसमें सुझाव दिया गया था कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए सामान्य सदन के बजाय ‘बजट सदन’ आयोजित करना अधिक व्यावहारिक होगा। तर्क यह है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 की समाप्ति से पहले बजट पास कराना अनिवार्य है। अगर बजट समय पर पास नहीं हुआ, तो शहर के विकास कार्य, सफाई व्यवस्था और कर्मचारियों के वेतन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर संकट खड़ा हो सकता है। अधिकारियों का दावा है कि इस नोटिंग पर मेयर कार्यालय से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिले, जिससे असमंजस की स्थिति और गहरी हो गई।

​. वीआईपी बैठक और व्यावहारिक कठिनाइयां

​आज यानी 23 मार्च को केवल नगर निगम की बैठक का ही मुद्दा नहीं है, बल्कि आगरा में उत्तर प्रदेश विधानमंडल की ‘सार्वजनिक उपक्रम एवं निगम संयुक्त समिति’ की एक महत्वपूर्ण बैठक भी प्रस्तावित है। इस उच्चस्तरीय बैठक में जिले के तमाम बड़े अधिकारियों की उपस्थिति अनिवार्य है। प्रशासनिक अमले का कहना है कि एक ही समय पर दो बड़ी बैठकों का आयोजन करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। इसी ‘प्रोटोकॉल’ और व्यस्तता को आधार बनाकर अधिकारी फिलहाल सदन की बैठक टालने के पक्ष में नजर आ रहे हैं।

​. पार्षदों में आक्रोश: सूचना के अभाव में ‘अंधेरे’ में प्रतिनिधि

​इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा प्रभावित शहर के पार्षद हो रहे हैं। पार्षदों का आरोप है कि उन्हें बैठक के संबंध में कोई आधिकारिक पत्र या सूचना प्राप्त नहीं हुई है। निगम प्रशासन और मेयर के बीच की इस ‘नूराकुश्ती’ में जनता के मुद्दे दबकर रह गए हैं। पार्षदों का कहना है कि यदि सदन नहीं चलता है, तो वे अपने क्षेत्रों की समस्याओं जैसे—जलभराव, स्ट्रीट लाइट और टूटी सड़कों का मुद्दा कहां उठाएंगे?

निष्कर्ष: विकास या सियासत?

​आगरा नगर निगम का यह टकराव केवल मेयर और अधिकारियों के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह शहर की व्यवस्था पर पड़ने वाले असर का संकेत है। जहां एक तरफ मेयर अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर सदन बुलाना चाहती हैं, वहीं दूसरी तरफ अधिकारी नियमों और बजट की दुहाई दे रहे हैं। यदि यह गतिरोध जल्द दूर नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में आगरा की जनता को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। देर रात तक किसी स्पष्ट निर्देश के अभाव में आज की बैठक का भविष्य अधर में लटका हुआ दिखाई दे रहा है।

पाठकों के लिए एक सवाल:

क्या आपको लगता है कि प्रशासनिक अधिकारियों को जन प्रतिनिधियों के निर्देशों का पालन करना चाहिए, या नियमों के नाम पर बैठकों को टालना उचित है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।