
आगरा। उत्तर प्रदेश के ताजनगरी आगरा में इन दिनों आम जनता एक अजीबोगरीब सरकारी उलझन में फंसी हुई है। खुशी का अवसर हो यानी बच्चे का जन्म, या शोक की घड़ी यानी परिवार में किसी की मृत्यु—दोनों ही स्थितियों में ‘प्रमाण पत्र’ हासिल करना किसी जंग जीतने जैसा हो गया है। नई प्रशासनिक व्यवस्था की जटिलताओं के कारण महीनों तक कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर जनता का सब्र अब जवाब दे रहा है।
जनता की इसी पीड़ा को लेकर आगरा की महापौर हेमलता दिवाकर कुशवाहा ने शनिवार को लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से विशेष मुलाकात की। उन्होंने मुख्यमंत्री को जमीनी हकीकत से रूबरू कराते हुए बताया कि कैसे एक छोटे से प्रमाण पत्र के लिए लोगों को तीन-चार महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है।
नई व्यवस्था बनी गले की फांस: आखिर क्यों हो रही है देरी?
कुछ समय पहले तक जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र के पंजीकरण की प्रक्रिया स्थानीय नगर निगम स्तर पर काफी सरल थी। लेकिन नई नियमावली के तहत 21 दिन की अवधि बीत जाने के बाद प्रमाण पत्र के पंजीकरण की जांच और आदेश का अधिकार उप जिलाधिकारी (एसडीएम) को सौंप दिया गया है।
महापौर ने सीएम को बताया कि एसडीएम स्तर पर पहले से ही राजस्व, कानून व्यवस्था और अन्य प्रशासनिक कार्यों का भारी बोझ रहता है। ऐसे में जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र की फाइलें उनके टेबल पर हफ्तों तक धूल फांकती रहती हैं। इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ रहा है, जिसे स्कूल दाखिले, बीमा क्लेम या विरासत जैसे कामों के लिए इन कागजों की तत्काल आवश्यकता होती है।
पुरानी व्यवस्था बनाम नई व्यवस्था: महापौर की दलील
मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखते हुए महापौर ने पुरानी और सुगम व्यवस्था का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि पहले नगर निगम के उप निबंधक (जन्म-मृत्यु) के पास एक महीने तक बिना शपथ पत्र के और एक साल तक शपथ पत्र के आधार पर पंजीकरण का अधिकार था। एक साल से अधिक पुराने मामलों में ही अपर जिला मजिस्ट्रेट हस्तक्षेप करते थे।
महापौर हेमलता दिवाकर का तर्क है कि, “पुरानी व्यवस्था में जनता को दर-दर नहीं भटकना पड़ता था। नई प्रक्रिया ने न केवल जटिलता बढ़ाई है, बल्कि नगर निगम पर भी जनता का आक्रोश बढ़ा दिया है, जबकि देरी का कारण दूसरे विभागों की व्यस्तता है।”
समाधान के लिए सुझाया ‘पावर डेलीगेशन’ का फार्मूला
प्रशासनिक सुधार के लिए महापौर ने मुख्यमंत्री को बेहद व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। उन्होंने मांग की कि:
- नगर निगम में तैनात पीसीएस अधिकारी को एक वर्ष तक के मामलों के निस्तारण का अधिकार वापस दिया जाए।
- एक वर्ष से अधिक पुराने प्रकरणों के लिए जिलाधिकारी के अधीन अपर नगर मजिस्ट्रेट (एसीएम) को अधिकृत किया जाए।
- वर्तमान में चल रही ऑनलाइन प्रणाली की तकनीकी खामियों और धीमी गति को तुरंत सुधारा जाए।
माना जा रहा है कि यदि ये अधिकार वापस नगर निगम के अधिकारियों को मिलते हैं, तो फाइलों का बोझ कम होगा और लोगों को 15-20 दिनों के भीतर प्रमाण पत्र मिल सकेंगे।
भ्रष्टाचार और ई-टेंडरिंग पर भी तीखे प्रहार
मुलाकात के दौरान महापौर केवल प्रमाण पत्र के मुद्दे पर ही नहीं रुकीं, बल्कि उन्होंने आगरा नगर निगम के भीतर चल रहे ‘अंदरूनी खेल’ की भी पोल खोली। उन्होंने निर्माण कार्यों में थर्ड पार्टी जांच की पुरजोर मांग की।
महापौर ने आरोप लगाया कि शासन के निर्देशों के बावजूद ई-टेंडरिंग की जगह ऑफलाइन बॉक्स प्रणाली से काम कराए जा रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री को अवगत कराया कि इस मनमानी के कारण करीब 9 करोड़ रुपये की वित्तीय हानि का अनुमान है। ठेके देने में रोस्टर प्रणाली का उल्लंघन और कुछ खास लोगों को उपकृत करने की शिकायतों पर उन्होंने कड़ा रुख अपनाने का अनुरोध किया।
निष्कर्ष: क्या बदलेगी ताजनगरी की तस्वीर?
आगरा की महापौर का मुख्यमंत्री से मिलना और सीधे तौर पर प्रशासनिक खामियों को उजागर करना यह दर्शाता है कि स्थानीय निकाय और प्रशासन के बीच तालमेल की कमी का खामियाजा जनता भुगत रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हमेशा ‘ईज ऑफ लिविंग’ (Ease of Living) पर जोर दिया है, ऐसे में उम्मीद है कि जल्द ही जन्म-मृत्यु पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल बनाने के निर्देश जारी होंगे।
यदि मुख्यमंत्री इन सुझावों पर मुहर लगाते हैं, तो आगरा ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के नगर निगमों में लंबित पड़े हजारों मामलों का निस्तारण तेजी से हो सकेगा।
पाठकों के लिए प्रश्न:
क्या आपको भी सरकारी कार्यालयों में जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में देरी का सामना करना पड़ा है? आपके अनुसार इस प्रक्रिया को और सरल कैसे बनाया जा सकता है? कमेंट में अपनी राय साझा करें।



