विशेष रिपोर्ट: शिक्षा के बढ़ते बाज़ारीकरण और ‘कमीशन कल्चर’ ने मध्यमवर्गीय परिवारों की रातों की नींद उड़ा दी है। तीसरी कक्षा की किताबों का सेट अब स्मार्टफोन से भी महंगा बिक रहा है।

​नया साल, नई क्लास और नई उम्मीदें—अमूमन एक बच्चे के लिए नया शैक्षणिक सत्र (Academic Session) उत्साह लेकर आता है, लेकिन आज के दौर में यह उत्साह अभिभावकों के लिए किसी आर्थिक त्रासदी से कम नहीं है। देश के लगभग हर शहर से एक ही जैसी तस्वीरें और शिकायतें सामने आ रही हैं: स्कूलों द्वारा निर्धारित खास दुकानों पर घंटों लंबी कतारें, ऊंचे दाम और किताबों-वर्दी के नाम पर की जा रही ‘खुली लूट’।

​1. तीसरी कक्षा का सेट 8 हजार के पार: जेब पर सीधा प्रहार

​हैरानी की बात है कि जहाँ सरकारी स्तर पर शिक्षा को सुलभ बनाने की बातें होती हैं, वहीं निजी स्कूलों में कक्षा 3 जैसी छोटी क्लास की किताबों और कॉपियों का सेट 8,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक बिक रहा है। इसमें केवल किताबें ही नहीं, बल्कि स्कूल द्वारा अनिवार्य की गई विशेष स्टेशनरी, पेंटिंग किट और डायरी भी शामिल होती है।

​अभिभावकों का आरोप है कि स्कूलों ने जानबूझकर ऐसे निजी प्रकाशकों (Private Publishers) की किताबें लगाई हैं, जिनकी कीमत NCERT की तुलना में पांच से दस गुना अधिक होती है।

​2. ‘निर्धारित दुकान’ और ‘गुप्त पते’ का खेल

​निजी स्कूलों की मनमानी यहीं नहीं रुकती। अधिकांश स्कूल प्रबंधन अभिभावकों को एक विशेष सूची थमा देते हैं और मौखिक या लिखित रूप से यह निर्देश देते हैं कि सामान केवल ‘अमुक’ दुकान से ही खरीदना होगा। विडंबना देखिए कि ये दुकानें अक्सर शहर के मुख्य बाजारों में न होकर गलियों या दूर-दराज के इलाकों में होती हैं, जिन्हें ढूंढने में अभिभावकों के पसीने छूट जाते हैं।

​जब कोई अभिभावक किसी दूसरी दुकान से वही किताबें खरीदने की कोशिश करता है, तो उसे ‘आउट ऑफ स्टॉक’ या ‘नया एडिशन’ न होने का बहाना बताकर लौटा दिया जाता है। यह सीधा-सादा ‘सिंडिकेट’ है जो स्कूल और दुकानदार के बीच कमीशन के आधार पर चलता है।

​3. ‘पूरा सेट ही लेना होगा’ – फुटकर बिक्री पर पाबंदी

​एक और बड़ी समस्या ‘बंडल सिस्टम’ की है। यदि किसी छात्र के पास पिछले साल की कुछ स्टेशनरी या बड़े भाई-बहन की पुरानी किताबें मौजूद हैं, तब भी दुकानदार उसे केवल चुनिंदा किताबें देने से मना कर देते हैं। ग्राहकों को मजबूर किया जाता है कि वे पूरा सेट ही खरीदें। इसमें ए-4 साइज की विशिष्ट कॉपियां, कवर और यहाँ तक कि स्कूल के लोगो वाले जूते-मोजे भी शामिल होते हैं, जो बाजार में मिलने वाले सामान्य और बेहतर गुणवत्ता वाले सामानों से कहीं अधिक महंगे होते हैं।

​4. नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक सुस्ती

​शिक्षा विभाग के स्पष्ट निर्देश हैं कि कोई भी स्कूल किसी विशेष दुकान से सामान खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता और न ही हर साल पाठ्यक्रम (Syllabus) में अनावश्यक बदलाव कर सकता है। बावजूद इसके, सत्र शुरू होते ही नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं।

​हालिया कुछ मामलों में प्रशासन ने कुछ स्कूलों पर छापेमारी की और पाया कि स्कूल परिसर के भीतर ही ड्रेस और किताबें बेची जा रही थीं, जो कि पूरी तरह से व्यावसायिक गतिविधि है और नियमों के विरुद्ध है। हालांकि, नोटिस और जांच की प्रक्रिया इतनी धीमी होती है कि जब तक कोई कार्रवाई होती है, तब तक अधिकांश अभिभावक मजबूरी में सामान खरीद चुके होते हैं।

​5. अभिभावकों का बढ़ता आक्रोश और ‘पापा’ जैसे संगठनों की पहल

​इस शोषण के खिलाफ अब अभिभावक एकजुट होने लगे हैं। विभिन्न शहरों में ‘प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स’ जैसे संगठन सड़कों पर उतर रहे हैं। इनका कहना है कि निजी स्कूल शासनादेशों को ठेंगे पर रखकर आर्थिक शोषण कर रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों और हंगामे के बावजूद, स्कूल प्रबंधन अक्सर यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि “हम केवल बेहतर शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री का सुझाव देते हैं।”

​निष्कर्ष (Conclusion)

​शिक्षा एक सेवा है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यह एक ऐसा उद्योग बन चुका है जहाँ ‘ग्राहक’ (अभिभावक) के पास विकल्प चुनने की आजादी ही छीन ली गई है। महंगी फीस के बाद किताबों और ड्रेस के नाम पर यह अतिरिक्त वसूली न केवल अनैतिक है, बल्कि उन परिवारों के सपनों पर भी प्रहार है जो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं। जब तक सरकार और शिक्षा विभाग इन निजी संस्थानों की जवाबदेही तय नहीं करेंगे और ‘NCERT अनिवार्य’ जैसे नियमों को कड़ाई से लागू नहीं करेंगे, तब तक यह लूट जारी रहेगी।

अभिभावकों के लिए विचारणीय प्रश्न:

​क्या आपको भी लगता है कि स्कूलों को केवल पाठ्यक्रम तय करना चाहिए, न कि दुकान? क्या आपके शहर में भी शिक्षा के नाम पर ऐसी ही मनमानी चल रही है? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं।