आगरा। ताजनगरी की आबोहवा में इन दिनों फाल्गुन की मस्ती घुली हुई है। लेकिन सोमवार को रावतपाड़ा की तंग गलियों से लेकर जौहरी बाजार के चौराहों तक जो नजारा दिखा, उसने मथुरा की लठमार होली और काशी की मणिकर्णिका घाट वाली ‘मसाने की होली’ की याद ताजा कर दी। अवसर था—आराध्य बाबा मनःकामेश्वर नाथ के दिव्य डोले के नगर भ्रमण का। जब बाबा का रथ निकला, तो पूरा शहर ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा और आसमान अबीर-गुलाल के साथ-साथ शिव भक्ति की भस्म से पट गया।

​आस्था का सैलाब और काशी सा अलौकिक दृश्य

​कहते हैं कि जब महादेव अपनी टोली के साथ निकलते हैं, तो प्रकृति भी झूम उठती है। आगरा के प्राचीन श्री मनकामेश्वर मंदिर में सुबह से ही उत्सव का माहौल था। वैदिक मंत्रोच्चार और शंखध्वनि के बीच बाबा की मंगल आरती हुई। मंदिर के श्री महंत योगेश पुरी ने जब बाबा के श्री विग्रह का विधि-विधान से पूजन कर उन्हें नंदी पर विराजमान किया, तो भक्तों का धैर्य जवाब दे गया। हर कोई अपने आराध्य की एक झलक पाने को लालायित दिखा।

​यह केवल एक धार्मिक जुलूस नहीं था, बल्कि यह आगरा की उस सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन था, जो सदियों से चली आ रही है। डोले में सबसे आगे गजानन की सवारी चल रही थी, जो विघ्नहर्ता के रूप में मार्ग प्रशस्त कर रहे थे। उनके पीछे सुसज्जित झांकियों में विराजमान बाबा मनःकामेश्वर नाथ के दर्शन पाकर श्रद्धालु निहाल हो गए।

​जब श्मशान की भस्म बनी होली का रंग: मसाने की होली का जादू

​इस आयोजन का मुख्य आकर्षण ‘मसाने की होली’ रही। डोले के साथ चल रहे शिवभक्तों ने खुद को भस्म और अबीर से सराबोर कर रखा था। कोई डमरू बजा रहा था, तो कोई हाथों में त्रिशूल लिए शिव तांडव की मुद्रा में था। भस्म-रंगे शिवगणों और रुद्राक्ष की माला पहने श्रद्धालुओं को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं कैलाश पर्वत आगरा की धरती पर उतर आया हो।

​ढोल, नगाड़े और चंग की थाप पर थिरकते भक्तों ने वातावरण को इतना भक्तिमय बना दिया कि राह चलते राहगीर भी अपने कदम रोककर इस उत्सव का हिस्सा बन गए। चिम्मन चौराहा और सुभाष बाजार में तो स्थिति यह थी कि पैर रखने तक की जगह नहीं बची थी।

​फाग गायकों की टोली और विदेशी मेहमानों का संगम

​इस पारंपरिक डोले में लोक संस्कृति का तड़का लगाने के लिए गढ़ी ईश्वरा से फाग गायकों की विशेष टोली बुलाई गई थी। चंग की थाप पर जब उन्होंने ‘रसिया’ और ‘शिव-स्तुति’ गाना शुरू किया, तो विदेशी पर्यटक भी खुद को रोक नहीं पाए। सात समंदर पार से आए सैलानी भारतीय सनातन परंपरा की इस अनूठी छटा को देखकर दंग थे। वे न केवल इस दृश्य को अपने कैमरों में कैद कर रहे थे, बल्कि ‘बम-बम भोले’ के नारे लगाते हुए स्थानीय लोगों के साथ गुलाल भी खेल रहे थे।

​रावत पाड़ा से लेकर दरेसी तक, रास्ते भर स्थानीय लोगों ने डोले का भव्य स्वागत किया। छतों से पुष्पवर्षा की गई और जगह-जगह श्रद्धालुओं के लिए जलपान व ठंडाई की व्यवस्था की गई। यह दृश्य उस ‘साझा संस्कृति’ की मिसाल था, जिसके लिए आगरा जाना जाता है।

​ महंत योगेश पुरी का संदेश: वैराग्य और आनंद का संगम

​आयोजन के दौरान श्री महंत योगेश पुरी ने इस परंपरा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “होली का यह डोला केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह महादेव के वैराग्य और सांसारिक आनंद के अद्वितीय मिलन का प्रतीक है। जिस तरह महादेव श्मशान की भस्म और उत्सव के गुलाल को समान भाव से स्वीकार करते हैं, वही संदेश यह डोला समाज को देता है।”

​मठ प्रशासक हरिहर पुरी ने बताया कि प्राचीन काल में आगरा में कई डोले निकलते थे, लेकिन बदलते समय के साथ कई परंपराएं लुप्त हो गईं। श्री मनकामेश्वर मंदिर आज भी इस गौरवशाली परंपरा को जीवंत रखे हुए है, ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे।

​निष्कर्ष: भक्ति जब उत्सव बन जाए

​बाबा मनःकामेश्वर नाथ के डोले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आगरा केवल पत्थरों की इमारतों का शहर नहीं है, बल्कि यह भावनाओं और अटूट आस्था का केंद्र भी है। ‘मसाने की होली’ ने यह संदेश दिया कि ईश्वर की भक्ति में जब उत्सव का समावेश होता है, तो पूरा नगर ही शिवधाम बन जाता है। रंग, गुलाल और भस्म के इस मेल ने शहर के हर नागरिक के मन में प्रेम और भाईचारे का नया संचार किया है।