
नई दिल्ली/आगरा। रंगों का त्योहार होली खुशियों, आपसी प्रेम और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन होता है और अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को रंगों वाली होली खेली जाती है। लेकिन वर्ष 2026 में तिथियों की गणना और चंद्र ग्रहण के संयोग ने लोगों के बीच इस त्योहार की तारीख को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है।
सोशल मीडिया और पंचांगों के बीच चल रही चर्चाओं को विराम देते हुए, ज्योतिषियों और शास्त्र सम्मत गणनाओं ने अब स्थिति साफ कर दी है। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस साल होली 3 मार्च को है या 4 मार्च को, और होलिका दहन की पूजा का सबसे सटीक समय क्या है।
होली 2026: कब है रंगों का उत्सव?
शास्त्रों (धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु) के अनुसार, उदया तिथि और परंपराओं को देखते हुए इस साल रंगों वाली होली 4 मार्च 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। हालांकि पूर्णिमा तिथि 2 और 3 मार्च को व्याप्त है, लेकिन चंद्र ग्रहण और प्रतिपदा तिथि के संयोग के कारण 4 मार्च का दिन ही रंगों के उत्सव के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
होलिका दहन 2026: शुभ मुहूर्त और भद्रा का साया
होलिका दहन के लिए शास्त्रों में तीन मुख्य नियम बताए गए हैं: पूर्णिमा तिथि का होना, भद्रा का न होना और प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय)।
आचार्य मुकेश मिश्रा और ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च 2026 की शाम 5:18 बजे से शुरू होकर 3 मार्च की दोपहर 4:33 बजे तक रहेगी। इस दौरान भद्रा का साया भी रहेगा, जो 2 मार्च की शाम से शुरू होकर 3 मार्च की सुबह तक चलेगा।
- होलिका दहन की तिथि: 2 मार्च 2026 की देर रात (यानी 3 मार्च की शुरुआत)।
- भद्रा पूंछ मुहूर्त: रात 12:50 बजे (2 मार्च की रात)।
- वैकल्पिक मुहूर्त: यदि आप 3 मार्च की शाम को दहन करना चाहते हैं, तो शुभ मुहूर्त शाम 6:22 बजे से रात 8:50 बजे तक रहेगा।
शास्त्रों के अनुसार, भद्रा के ‘मुख’ काल में दहन वर्जित है, इसलिए ‘भद्रा पूंछ’ के समय दहन करना सुख-समृद्धि प्रदायक माना जाता है।
होली पर चंद्र ग्रहण का साया: क्या होगा असर?
साल 2026 की होली इसलिए भी खास और अलग है क्योंकि 3 मार्च को चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। यह ग्रहण दोपहर 3:21 बजे से शुरू होकर शाम 6:46 बजे तक रहेगा। भारत में दृश्य होने के कारण इसका सूतक काल सुबह 6:20 बजे से ही प्रभावी हो जाएगा।
सूतक और ग्रहण के दौरान किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य या रंग खेलने की मनाही होती है। यही मुख्य कारण है कि 3 मार्च को स्नान-दान की पूर्णिमा तो मनाई जाएगी, लेकिन रंगों की होली अगले दिन यानी 4 मार्च को खेली जाएगी।
होलाष्टक और रंगभरी एकादशी का महत्व
होली से आठ दिन पहले होलाष्टक लग जाता है, जिसे शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है।
- होलाष्टक प्रारंभ: 24 फरवरी 2026
- रंगभरी एकादशी: 27 फरवरी 2026 (इस दिन से काशी समेत कई हिस्सों में रंगों की शुरुआत हो जाती है)।
- होलाष्टक समाप्ति: 3 मार्च 2026
होलिका पूजन की सही विधि
होलिका दहन की पूजा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि नकारात्मकता को जलाने का प्रतीक है। पूजन के समय इन बातों का ध्यान रखें:
- दिशा: पूजा करते समय अपना मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें।
- सामग्री: थाली में रोली, अक्षत, फूल, हल्दी, मूंग, गुड़, और नई फसल (गेहूं की बालियां, चना) जरूर रखें।
- परिक्रमा: होलिका की पूजा के बाद सात या तीन बार परिक्रमा करना शुभ माना जाता है।
- अर्पण: अग्नि में ताजी फसल और उपलों की माला अर्पित करें ताकि घर में अन्न-धन की बरकत बनी रहे।
निष्कर्ष
संक्षेप में कहें तो, इस बार होली का पर्व भक्ति और सावधानी का संगम है। 2 मार्च की रात होलिका दहन, 3 मार्च को चंद्र ग्रहण के कारण संयम और 4 मार्च 2026 को पूरे उत्साह के साथ रंगों वाली होली मनाना शास्त्र सम्मत है। तिथियों का यह फेरबदल प्रकृति और खगोलीय घटनाओं का हिस्सा है, जिसे स्वीकार करते हुए हमें भाईचारे का यह पर्व मनाना चाहिए।
पाठकों के लिए सवाल: आपके क्षेत्र में होली की क्या विशेष परंपरा है? क्या आप भी इस बार चंद्र ग्रहण को देखते हुए अपनी योजना बदल रहे हैं? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।



