
विजयादशमी के लिए विशेष तैयारी: आगरा रामलीला में 50 दिनों से जुटा मथुरा का कारीगर परिवार
आगरा: कल विजयादशमी (दशहरा) है और शहर के बिजली घर मैदान पर चल रही ऐतिहासिक रामलीला का समापन होने जा रहा है। इस भव्य आयोजन में इस बार का सबसे बड़ा आकर्षण होगा 110 फुट ऊँचा रावण का विशालकाय पुतला। इस पुतले को अंतिम रूप देने में मथुरा का एक मुस्लिम कारीगर परिवार पिछले 50 दिनों से अथक मेहनत कर रहा है, जो धार्मिक सद्भाव और अटूट समर्पण की एक अनोखी मिसाल पेश करता है।
आगरा की यह रामलीला करीब 140 साल पुरानी है, और इससे भी अधिक वर्षों से रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाने की ज़िम्मेदारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसी मुस्लिम परिवार के पास रही है। यह परिवार पाँच पीढ़ियों से इस परंपरा को निभा रहा है, जो दिखाता है कि कला और आस्था की कोई सीमा नहीं होती।
पाँच पीढ़ियों की विरासत: जाफर अली और परिवार का 46 वर्षों का अटूट समर्पण
इस महान परंपरा को आज भी जीवित रखे हुए हैं कारीगर जाफर अली, जो स्वयं पिछले 46 वर्षों से रावण के पुतले तैयार कर रहे हैं। जाफर अली बताते हैं कि, “जब से बिजली घर मैदान पर रामलीला शुरू हुई है, तभी से हमारा परिवार इस परंपरा से जुड़ा हुआ है। पहले मेरे पिता मोहम्मद वहीर और दादा मुग़ल पहलवान पुतले बनाते थे। अब हम और आगे हमारे बच्चे इस काम को पूरी लगन से निभाएंगे। यह काम कभी बंद नहीं होगा।
“उनका यह बयान केवल एक कारीगर की बात नहीं है, बल्कि यह देश की उस साझा संस्कृति की कहानी है, जहाँ धर्म से बढ़कर प्रेम और समर्पण को महत्व दिया जाता है।
इस बार पुतलों में विशेष आकर्षण: 110 फीट का रावण और घूमती हुई आँखें
इस बार विजयादशमी के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए पुतलों में कई आकर्षण हैं। इनमें 45 फुट ऊँचा कुंभकर्ण, 70 फुट का मेघनाथ और सबसे भव्य 110 फुट का रावण शामिल है।लेकिन इस बार की सबसे खास बात यह है कि रावण के पुतले की आँखें मूवमेंट करेंगी, जो दर्शकों के लिए एक बड़ा और रोमांचक आकर्षण होंगी। 20 अगस्त से लगातार मेहनत कर तैयार किए जा रहे इन पुतलों के दहन के साथ कल शाम आकर्षक आतिशबाजी भी होगी, जो आगरा में ऐतिहासिक विजयादशमी के जश्न को और भी भव्य बनाएगी।
कारीगर परिवार का कहना है कि भले ही वे मुस्लिम हैं, लेकिन रामलीला और इस काम के प्रति उनका जुड़ाव भावनात्मक है। जाफर अली ने कहा, “हमें यह काम करने में बहुत आनंद आता है। यह हमारी परंपरा है और हम इसे दिल से निभाते हैं।” उनका यह समर्पण सिद्ध करता है कि कला और धर्म के बीच कोई दीवार नहीं होती, और भारत की मिट्टी में एकता और भाईचारे की जड़ें कितनी गहरी हैं।




