भारत की समृद्ध जैव विविधता और बेजुबान वन्यजीवों की सुरक्षा हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। वन्यजीव तस्करी और अवैध शिकार के नेटवर्क आज इतने जटिल हो चुके हैं कि इनसे केवल लाठी या सजा के दम पर नहीं निपटा जा सकता। इसी गंभीर विषय पर मंथन करने के लिए उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित हिंदुस्तान कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में एक बेहद महत्वपूर्ण मंच सजा। मौका था—’वन्यजीव अपराध और वन्यजीव अपराध से प्राप्त आय की जब्ती’ पर आयोजित तीसरी एक दिवसीय कार्यशाला का।

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​इस कार्यशाला का आयोजन अग्रणी संरक्षण संस्था वाइल्डलाइफ एसओएस (Wildlife SOS) ने न्यायपालिका, उत्तर प्रदेश वन विभाग, पुलिस विभाग और जिला प्रशासन के आपसी सहयोग से किया। कार्यक्रम में कानूनी विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने इस बात पर जोर दिया कि वन्यजीवों को बचाने के लिए कड़े कानूनों के साथ-साथ मानवीय दृष्टिकोण, समाज में जागरूकता और अपराधियों के पुनर्वास की सख्त जरूरत है।

​अंतर-एजेंसी समन्वय: वन्यजीव तस्करी नेटवर्क को ध्वस्त करने की अनूठी पहल

​इस एक दिवसीय कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य वन्यजीव अपराध से निपटने में लगे विभिन्न विभागों—जैसे वन विभाग, न्यायपालिका, पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारियों के ज्ञान, जांच क्षमताओं और आपसी तालमेल (अंतर-एजेंसी समन्वय) को बढ़ाना था। अक्सर देखा जाता है कि एजेंसियों के बीच आपसी समन्वय की कमी के कारण वन्यजीव तस्करी के बड़े अपराधी कानून की कमियों का फायदा उठाकर बच निकलते हैं।

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​इस कार्यशाला के माध्यम से कानूनी और प्रवर्तन तंत्र को मजबूत करने की कोशिश की गई, ताकि न केवल जमीनी स्तर पर वन्यजीव अपराधों को रोका जा सके, बल्कि अदालतों में भी ठोस सबूतों के साथ अपराधियों को सजा दिलाई जा सके और उनके वित्तीय नेटवर्क (अपराध से प्राप्त आय) को पूरी तरह से ध्वस्त किया जा सके।

​दिग्गज हस्तियों की मौजूदगी में हुआ कार्यशाला का भव्य आगाज

​इस गरिमामयी कार्यशाला का औपचारिक उद्घाटन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के माननीय न्यायूमूर्ति सत्यवीर सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर आगरा और मथुरा मंडलों के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, आगरा और मथुरा जोन के जिला वन अधिकारी (DFO) सहित पुलिस और प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे

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​कार्यशाला ने वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों, अभियोजकों, वन अधिकारियों और प्रवर्तन अधिकारियों को एक साथ लाकर व्यावहारिक चुनौतियों और प्रभावी रणनीतियों पर चर्चा करने के लिए एक मजबूत मंच प्रदान किया। सत्र के दौरान आधुनिक जांच तकनीकों, वन्यजीव अपराध के वित्तीय पहलुओं (मनी लॉन्ड्रिंग), अदालती प्रक्रियाओं और विभिन्न एजेंसियों के बीच तुरंत और समन्वित कार्रवाई के महत्व पर गहन चर्चा हुई।

​केस स्टडीज के जरिए समझी गईं व्यावहारिक चुनौतियाँ

​कार्यशाला के दौरान व्यावहारिक अनुभवों को साझा करने के लिए कई विशेषज्ञ सत्र आयोजित किए गए। वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण ने भारत भर में संगठन द्वारा चलाए गए क्षेत्रीय अभियानों से संबंधित प्रमुख केस स्टडीज (Case Studies) प्रस्तुत कीं। इन वास्तविक मामलों ने अधिकारियों को यह समझने में मदद की कि जमीनी स्तर पर तस्कर किस तरह काम करते हैं।

​इन सत्रों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए देश के कई बड़े कानूनी और जांच विशेषज्ञ शामिल हुए, जिनमें शामिल थे:

  • दीपक चौहान (संयुक्त निदेशक, प्रवर्तन निदेशालय)
  • सुशील कुमार शुक्ला (वरिष्ठ अधिवक्ता, इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
  • करमबीर सिंह नलवा (विशेष अभियोजक, एनआईए और वरिष्ठ अधिवक्ता, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय)
  • विनय कुमार ओझा (विशेष अभियोजक, सीबीआई मुख्यालय, नई दिल्ली)
  • कुमार किसलय (पार्टनर, ज्योति सागर एंड एसोसिएट)
  • तरुण नांगिया (वरिष्ठ कानूनी पत्रकार)

​”सजा से बड़ा है पुनर्वास और करुणा” – न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह

​कार्यशाला को संबोधित करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश सत्यवीर सिंह ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में पिछले तीन दशकों से काम कर रहे वाइल्डलाइफ एसओएस के प्रयासों की जमकर सराहना की। उन्होंने एक बहुत ही गहरी और मानवीय बात कही:

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​”पुनर्वास, जागरूकता और सही मार्गदर्शन अक्सर कड़े दंड की तुलना में समाज में अधिक सार्थक और स्थायी परिवर्तन लाते हैं।”

​न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह ने विशेष रूप से वाइल्डलाइफ एसओएस के उस मॉडल की प्रशंसा की, जिसके तहत वे जानवरों के शोषण में शामिल समुदायों (जैसे कालबेलिया या मदारी समुदाय) को वैकल्पिक आजीविका प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब तक हम इन समुदायों को मुख्यधारा से जोड़कर उनके पुनर्वास की व्यवस्था नहीं करेंगे, तब तक वन्यजीव अपराध को जड़ से खत्म करना नामुमकिन है।

​अपने संबोधन में उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहा कि, “किसी राष्ट्र का न्याय उसके गरीबी में रहने वाले नागरिकों द्वारा महसूस की जाने वाली सुरक्षा की भावना में निहित है।” इसके साथ ही उन्होंने मथुरा के हाथी संरक्षण एवं देखभाल केंद्र में मौजूद एक नेत्रहीन हथनी की दयनीय स्थिति को याद करते हुए भावुक अंदाज़ में कहा कि इंसानों को जानवरों के प्रति सहानुभूति और करुणा रखनी ही होगी। उन्होंने डॉ. बी. आर. अंबेडकर और डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के आदर्शों का आह्वान करते हुए समाज से हर तरह के भेदभाव को मिटाने और अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने की अपील की।

​सामूहिक प्रयास ही बदलेंगे देश की तस्वीर

​वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण ने कार्यशाला के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा, “न्यायपालिका, प्रवर्तन एजेंसियों और संरक्षण एक्सपर्ट्स को एक साथ लाकर, इस कार्यशाला का उद्देश्य भारत की समृद्ध जैव विविधता की रक्षा करते हुए वन्यजीव अपराधों की जांच, अभियोजन और रोकथाम के लिए आवश्यक सामूहिक क्षमता को मजबूत करना है।”

​वहीं, संस्था की सह-संस्थापक और सचिव गीता शेषमणि ने जोर देकर कहा कि संरक्षण का काम अकेले नहीं हो सकता। जब सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं मिलकर काम करेंगी, तभी वन्यजीव कानूनों और जांच प्रक्रियाओं की बेहतर समझ विकसित होगी, जिससे बेजुबान जानवरों को अधिक प्रभावी सुरक्षा मिल सकेगी।

​कार्यक्रम के अंत में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता श्री सत्य नारायण वशिष्ठ ने समापन भाषण दिया और वाइल्डलाइफ एसओएस के डायरेक्टर कंज़रवेशन प्रोजेक्ट्स श्री बैजू राज एम.वी. ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।