बढ़ते तापमान और कंक्रीट के जंगलों के बीच क्या हम एक ऐसे भविष्य की कल्पना कर सकते हैं जहाँ न तो पक्षियों की चहचहाहट हो और न ही छाया देने वाले पेड़? शायद नहीं। इसी चिंता को उम्मीद में बदलने और धरती को एक बार फिर से हरा-भरा बनाने के संकल्प के साथ, इस बार विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर उत्तर प्रदेश के मथुरा से एक बेहद खूबसूरत और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है।

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​2000 देशी पौधों से महकेगा मथुरा का हाथी संरक्षण केंद्र

​मथुरा स्थित हाथी संरक्षण एवं देखभाल केंद्र (Elephant Conservation and Care Centre) में आयोजित इस अभियान के तहत वाइल्डलाइफ एसओएस ने विभिन्न प्रजातियों के 2000 देशी वृक्ष लगाए। अक्सर देखा जाता है कि लोग दिखावे के लिए विदेशी या शो-प्लांट्स लगा देते हैं, जो स्थानीय पर्यावरण को कोई फायदा नहीं पहुँचाते। लेकिन इस अभियान की खास बात यह रही कि यहाँ केवल स्थानीय और फलदार पौधों को चुना गया।

​लगाए गए पौधों में मुख्य रूप से शामिल हैं:

  • ​300 जामुन और 300 अनार के पौधे
  • ​100 अमरूद और 300 शहतूत
  • ​300 इमली और 300 नीम के औषधीय पेड़
  • ​200 अंजीर और 200 कटहल के पेड़

​यह सिर्फ एक दिन का पौधारोपण नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक हरित गलियारे (Green Corridor) के निर्माण की नींव है। ये पेड़ जब बड़े होंगे, तो न केवल स्थानीय सूक्ष्म जलवायु (Micro Climate) को बेहतर करेंगे, बल्कि यहाँ रह रहे वन्यजीवों के लिए भोजन और आश्रय का भी बड़ा जरिया बनेंगे।

​”विलुप्ति सदा के लिए है”: जब बच्चों की कला ने झकझोरा दिल

​पर्यावरण को बचाने की यह जंग तब तक नहीं जीती जा सकती, जब तक इसमें नई पीढ़ी शामिल न हो। इसी सोच के साथ वाइल्डलाइफ एसओएस ने दो स्कूलों के कक्षा 6 से 12 तक के 20 चुनिंदा विद्यार्थियों के लिए एक बेहद संवेदनशील और रचनात्मक कार्यक्रम आयोजित किया।

​इस दौरान आयोजित चित्रकला प्रतियोगिता का विषय था— “विलुप्ति सदा के लिए है”। बच्चों ने अपनी कूची और रंगों के माध्यम से यह दिखाने की कोशिश की कि अगर आज हमने गौरैया, बाघ या हाथियों को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियाँ इन्हें सिर्फ किताबों में ही देख पाएंगी। बच्चों की इस कलात्मक अभिव्यक्ति ने वहाँ मौजूद हर शख्स को सोचने पर मजबूर कर दिया।

​”मूक प्राणियों की आवाज़ बनें”: नुक्कड़ नाटक से पशु क्रूरता पर प्रहार

​कार्यक्रम का सबसे भावुक और ऊर्जावान हिस्सा रहा विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत किया गया नुक्कड़ नाटक, जिसका शीर्षक था “मूक प्राणियों की आवाज़ बनें”। ढोलक की थाप और बुलंद आवाजों के बीच बच्चों ने अभिनय के जरिए इंसानी लालच, जंगलों के विनाश, अवैध शिकार और बेजुबान जानवरों पर होने वाली क्रूरता की दर्दनाक हकीकत को मंच पर उतारा।

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​इस नाटक का मुख्य उद्देश्य दर्शकों को यह समझाना था कि जानवर बोल नहीं सकते, इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें दर्द नहीं होता। हमें उनकी चीख को समझना होगा और उनके हक के लिए खड़ा होना होगा।

​विधायक और प्रशासनिक अधिकारियों ने बढ़ाया हौसला

​इस सराहनीय प्रयास को स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का भी पूरा समर्थन मिला। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बलदेव विधानसभा क्षेत्र के विधायक पूरन प्रकाश, विधायक प्रतिनिधि पंकज प्रकाश, मुख्य विकास अधिकारी (CDO) डॉ. पूजा गुप्ता और सामाजिक वानिकी प्रभाग के प्रभागीय निदेशक वेंकट श्रीकर पटेल उपस्थित रहे।

​सभी अतिथियों ने खुद अपने हाथों से हाथी संरक्षण केंद्र में पौधे लगाए और बच्चों के हुनर की जमकर तारीफ की। अधिकारियों ने माना कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित ऐसा वनीकरण ही आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

​क्या कहते हैं संस्था के कर्णधार?

कार्तिक सत्यनारायण (सह-संस्थापक एवं सीईओ, वाइल्डलाइफ एसओएस):

“विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह याद दिलाता है कि संरक्षण केवल जंगलों या रिजर्व एरिया तक सीमित नहीं है। इसकी शुरुआत समाज के हर स्तर पर जागरूकता से होती है। जब युवा कला और रंगमंच के माध्यम से अपनी बात रखते हैं, तो वे यह तय कर रहे होते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ प्रकृति की रक्षा कैसे करेंगी।”

गीता सेशमणि (सह-संस्थापक एवं सचिव, वाइल्डलाइफ एसओएस):

“संरक्षण का मूल आधार सहअस्तित्व (Co-existence) है। आज लगाया गया प्रत्येक वृक्ष उस पारिस्थितिक संतुलन को वापस लाने की दिशा में एक कदम है, जिस पर वन्यजीव निर्भर हैं।”

​वाइल्डलाइफ एसओएस के डायरेक्टर कंज़रवेशन प्रोजेक्ट्स, बैजूराज एम.वी. ने इस सफलता के लिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण और उत्तर प्रदेश वन विभाग का आभार व्यक्त किया।