हिंदू धर्म में संकटमोचन हनुमान जी एक ऐसे देवता हैं जिनकी भक्ति हर घर में देखने को मिलती है। कल यानी 2 अप्रैल को देशभर में हनुमान जन्मोत्सव की धूम रहेगी। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि साल में दो बार हनुमान जी का जन्मदिन मनाया जाता है? एक बार चैत्र मास की पूर्णिमा को और दूसरी बार दीपावली के आसपास कार्तिक मास की चतुर्दशी को।

​भक्तों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि एक ही देवता के दो जन्मदिवस कैसे हो सकते हैं? आखिर इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है और इन दोनों तिथियों का अलग-अलग महत्व क्या है? आइए, आज इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे साल में दो बार हनुमान जयंती मनाने के पीछे के मुख्य कारणों को।

​हनुमान जयंती और हनुमान जन्मोत्सव: क्या है अंतर?

​अक्सर लोग ‘जयंती’ और ‘जन्मोत्सव’ शब्दों को एक ही मान लेते हैं, लेकिन शास्त्रों के अनुसार इनमें सूक्ष्म अंतर है। ‘जयंती’ शब्द का प्रयोग उनके लिए किया जाता है जो इस संसार को छोड़कर जा चुके हैं, जबकि ‘जन्मोत्सव’ जीवित व्यक्ति या अमर आत्माओं के लिए मनाया जाता है। चूंकि हनुमान जी को ‘अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता’ और ‘चिरंजीवी’ (अमर) होने का वरदान प्राप्त है, इसलिए उनके लिए ‘जन्मोत्सव’ शब्द का प्रयोग अधिक सटीक माना जाता है।

​कब-कब मनाई जाती है हनुमान जयंती?

​भारत के अलग-अलग हिस्सों में हनुमान जी का जन्मदिन अलग-अलग समय पर मनाया जाता है:

  1. चैत्र पूर्णिमा: हिंदू कैलेंडर के पहले महीने यानी चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मुख्य रूप से हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 2 अप्रैल, गुरुवार को पड़ रहा है। दक्षिण भारत में इस तिथि का विशेष महत्व है।
  2. कार्तिक चतुर्दशी: उत्तर भारत के कई हिस्सों और विशेषकर अयोध्या जैसे क्षेत्रों में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी के दिन) को हनुमान जयंती मनाई जाती है।

​चैत्र पूर्णिमा: जब मिला था बजरंगबली को ‘नया जीवन’

​पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमान जी का असली जन्म तो कार्तिक मास में हुआ था, लेकिन चैत्र पूर्णिमा को उनका ‘दूसरा जन्म’ माना जाता है। कथा कुछ इस प्रकार है कि बाल्यकाल में हनुमान जी ने सूर्य को एक लाल फल समझ लिया और उसे खाने के लिए आकाश में उड़ चले।

​उसी समय राहु भी सूर्य को ग्रास बनाने वाला था, लेकिन हनुमान जी को देखकर वह घबरा गया और इंद्र के पास पहुंचा। इंद्रदेव ने क्रोध में आकर हनुमान जी पर अपने ‘वज्र’ से प्रहार किया, जिससे उनकी ठुड्डी (हनु) टूट गई और वे अचेत होकर गिर पड़े। इससे वायुदेव अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने पूरे ब्रह्मांड में वायु का संचार रोक दिया।

​सृष्टि पर आए संकट को देख ब्रह्मा जी और अन्य देवताओं ने वायुदेव को शांत किया और हनुमान जी को न केवल पुनः जीवित किया, बल्कि उन्हें अमरता और असीम शक्तियों का वरदान भी दिया। मान्यता है कि जिस दिन उन्हें यह ‘नया जीवन’ मिला, वह चैत्र पूर्णिमा की ही तिथि थी।

​कार्तिक चतुर्दशी: माता सीता का वरदान और विजय उत्सव

​दूसरी मान्यता के अनुसार, हनुमान जी का वास्तविक जन्म कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हुआ था। स्वामी तुलसीदास जी के वर्णन और अन्य ग्रंथों के अनुसार, इसी दिन अंजनी पुत्र का प्राकट्य हुआ था।

​इसके साथ ही एक और रोचक प्रसंग ‘विजय अभिनन्दन’ का है। जब प्रभु श्री राम रावण पर विजय प्राप्त कर माता सीता के साथ वापस लौटे, तो माता सीता ने हनुमान जी की निस्वार्थ भक्ति और सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें ‘अजर-अमर’ होने का आशीर्वाद दिया था। यह आशीर्वाद भी कार्तिक चतुर्दशी के समय दिया गया माना जाता है, इसलिए इस दिन को उनके विजय महोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।

​कैसे मनाएं हनुमान जन्मोत्सव?

​कल हनुमान जन्मोत्सव के अवसर पर भक्त सुबह जल्दी स्नान कर लाल वस्त्र धारण करें। हनुमान जी को सिंदूर, चमेली का तेल और लाल फूल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन हनुमान चालीसा, सुंदरकांड या बजरंग बाण का पाठ करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और शनि दोष से भी मुक्ति मिलती है।

​निष्कर्ष

​हनुमान जी के दो जन्मदिन मनाने के पीछे का रहस्य उनकी अनंत शक्तियों और उनके चिरंजीवी होने के प्रमाण को दर्शाता है। चाहे वह चैत्र पूर्णिमा का ‘शक्ति दिवस’ हो या कार्तिक चतुर्दशी का ‘जन्म दिवस’, दोनों ही तिथियां भक्तों के लिए श्रद्धा और भक्ति का संगम हैं।

​बजरंगबली की कृपा पाने के लिए सबसे जरूरी है मन की शुद्धता और भक्ति। कल के इस पावन पर्व पर आप भी हनुमान जी की आराधना करें और अपने जीवन को सकारात्मकता से भरें।

पाठकों के लिए प्रश्न:

आप हनुमान जन्मोत्सव किस प्रकार मनाते हैं? क्या आपके क्षेत्र में भी साल में दो बार यह पर्व मनाया जाता है? हमें कमेंट्स में जरूर बताएं।।