
आगरा। विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक नगरी फतेहपुर सीकरी, जो कभी अपनी वास्तुकला और बुलंद दरवाज़े के लिए दुनिया भर में जानी जाती थी, आज एक अदृश्य दुश्मन से जूझ रही है। यह दुश्मन है—तेजी से गिरता और जहरीला होता भूजल, साथ ही फेफड़ों में उतरती प्रदूषित हवा। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि विशेषज्ञों और श्रमिक नेताओं को डर है कि कहीं फतेहपुर सीकरी का हाल भी सदर तहसील के ‘पचगईं पट्टी’ गांव जैसा न हो जाए, जहाँ दूषित पानी ने पूरी पीढ़ी को शारीरिक विकलांगता के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।
रसातल में जाता जलस्तर और फ्लोराइड का बढ़ता डंक
फतेहपुर सीकरी और इसके ग्रामीण अंचलों में भूजल का स्तर न केवल नीचे जा रहा है, बल्कि जो पानी बचा है, वह भी पीने योग्य नहीं रहा। क्षेत्र के पानी में खारेपन (Salinity) और फ्लोराइड (Fluoride) की मात्रा मानक स्तर से कहीं अधिक पाई गई है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की रिपोर्ट ‘एक्विफर मैपिंग एंड मैनेजमेंट प्लान आगरा’ भी इस बात की तस्दीक करती है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यहाँ पेयजल का अकाल पड़ सकता है।
वर्तमान में स्थिति यह है कि हैंडपंपों से निकलने वाला पानी पीला और खारा हो चुका है, जो सीधे तौर पर हड्डियों और पेट की बीमारियों को दावत दे रहा है।
तेरहमोरी बांध: उपेक्षा की भेंट चढ़ी जल संचयन की जीवनरेखा
फतेहपुर सीकरी के इस जल संकट के पीछे प्रशासनिक लापरवाही की एक बड़ी कहानी छिपी है। जिले का सबसे बड़ा बांध, ‘तेरहमोरी बांध’, आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। सिंचाई विभाग (लोअर खंड आगरा) के अंतर्गत आने वाले इस बांध के गेट वर्षों से टूटे पड़े हैं।
उत्तर प्रदेश ग्रामीण मजदूर संगठन के नेताओं का कहना है कि मानसून के दौरान जब भारी मात्रा में पानी आता है, तो गेट टूटे होने के कारण वह रुक नहीं पाता और व्यर्थ बह जाता है। यदि इन गेटों की मरम्मत हो जाए और पानी का ठहराव सुनिश्चित हो, तो रसातल में जा चुका भूजल स्तर (Water Table) स्वतः ही रिचार्ज होने लगेगा। इससे न केवल पानी की उपलब्धता बढ़ेगी, बल्कि उसकी गुणवत्ता में भी सुधार होगा।
खारी नदी का सन्नाटा और सूखते कुएं
कभी किरावली तहसील की जीवनरेखा कही जाने वाली खारी नदी आज मानसून में भी सूखी रहती है। इसका सीधा संबंध तेरहमोरी बांध और भरतपुर के चिकसाना बांध के डिस्चार्ज से है। जब तक यह नदी बहती थी, क्षेत्र के गांवों के कुएं और हैंडपंप लबालब रहते थे। नदी के बहाव रुकने से प्राकृतिक रिचार्ज की प्रक्रिया थम गई है, जिसका खामियाजा अब स्थानीय किसानों और मजदूरों को भुगतना पड़ रहा है।
क्या फतेहपुर सीकरी बन जाएगा दूसरा ‘पचगईं पट्टी’?
सबसे डरावना पहलू सामाजिक और आर्थिक है। आगरा की सदर तहसील का पचगईं पट्टी गांव आज खराब पानी के कारण शारीरिक विकलांगता का पर्याय बन चुका है। फतेहपुर सीकरी के विकास खंड के गांवों में भी अब वैसी ही आहट सुनाई दे रही है।
श्रमिक नेता तुलाराम शर्मा बताते हैं, “यहाँ के श्रमिकों की शारीरिक क्षमता दूषित पानी के कारण घट रही है। जब ये मजदूर काम की तलाश में आगरा या भरतपुर जाते हैं, तो उनके आधार कार्ड पर ‘फतेहपुर सीकरी’ का पता देखते ही नियोक्ता कतराने लगते हैं। उन्हें डर होता है कि यहाँ का श्रमिक शारीरिक रूप से कमजोर होगा। यह एक गंभीर मानवाधिकार संकट है।”
जहरीली हवा और AQI का गिरता स्तर
सिर्फ पानी ही नहीं, फतेहपुर सीकरी की हवा भी अब सांस लेने लायक नहीं रही। राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी हवाओं में पार्टिकुलेट मैटर (PM 10 और PM 2.5) की मात्रा बहुत अधिक रहती है। ये सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई (Alveoli) तक पहुँचकर सीधे रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं, जिससे श्वसन संबंधी बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भूजल स्तर नहीं सुधरेगा, तब तक क्षेत्र में हरियाली का विस्तार संभव नहीं है। और बिना वृक्षारोपण के, वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) को सुधारना नामुमकिन है।
प्रशासन से उम्मीद और समाधान की दरकार
उत्तर प्रदेश ग्रामीण मजदूर संगठन ने इस संबंध में श्रम विभाग, स्वास्थ्य विभाग और पर्यावरण विभाग को कई पत्र लिखे हैं। संगठन की मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:
- तेरहमोरी बांध के गेटों की तत्काल मरम्मत: जिससे मानसून का पानी रोका जा सके।
- एक्विफर रिचार्ज योजना: CGWB की रिपोर्ट के आधार पर वैज्ञानिक तरीके से जल संचयन।
- स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन: श्रमिकों के लिए विशेष स्वास्थ्य जांच शिविर लगाए जाएं ताकि विकलांगता के प्रसार को रोका जा सके।
- वैकल्पिक रोजगार: पत्थर खदानें और चक्की के पाट का काम बंद होने के बाद बेरोजगार हुए श्रमिकों के लिए स्थानीय स्तर पर नए अवसर पैदा करना।
निष्कर्ष
फतेहपुर सीकरी का संकट केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह यहाँ के हजारों श्रमिकों के अस्तित्व की लड़ाई है। यदि तेरहमोरी बांध और खारी नदी के पुनरुद्धार पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इतिहास के पन्नों में दर्ज यह नगरी केवल धूल और सूखे का पर्याय बनकर रह जाएगी। प्रशासन को अब ‘बूंद-बूंद बचाओ’ के नारों से आगे बढ़कर बुनियादी ढांचे को सुधारने पर काम करना होगा।



