पत्रकारिता की दुनिया में जब भी नैतिकता और साख की बात होती है, तो अक्सर बड़े-बड़े संपादकों के चेहरे सामने आते हैं। लेकिन आज के दौर में, जहाँ न्यूज़ रूम्स अक्सर ‘सत्ता के गलियारों’ की परिक्रमा करते नजर आते हैं, एक ऐसी कहानी सामने आई है जिसने सफलता की परिभाषा ही बदल दी है। यह कहानी है संजीव श्रीवास्तव की—एक ऐसा नाम जो कभी भारतीय पत्रकारिता का शिखर था, लेकिन आज उनकी पहचान जयपुर की एक छोटी सी कचौड़ी की दुकान है।

​यह कोई मजबूरी का किस्सा नहीं है, बल्कि एक सचेत चुनाव (Conscious Choice) की दास्तां है।

​सत्ता के गलियारों से ‘कड़ाही’ तक का सफर

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​संजीव श्रीवास्तव कोई साधारण नाम नहीं रहे हैं। साल 2006 में वे BBC Hindi के इंडिया हेड थे। उन्होंने मुंबई ब्यूरो की नींव रखी और अपनी तीखी रिपोर्टिंग व निष्पक्ष विश्लेषण के लिए जाने गए। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ और ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में उनके शब्दों की धमक सुनाई देती थी। पत्रकारिता का हर छात्र उस मुकाम पर पहुँचने का सपना देखता है, जहाँ संजीव वर्षों तक रहे।

​लेकिन, अचानक ऐसा क्या हुआ कि टीवी की चमकती लाइट्स के नीचे बैठने वाला व्यक्ति कड़ाही के पास खड़ा होकर कचौड़ियाँ तलने लगा? इसका जवाब उनकी हार में नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान में छिपा है।

​जब ‘सत्य’ और ‘समझौते’ के बीच चुनाव करना पड़ा

​आज के मीडिया परिदृश्य में एक पत्रकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी निष्पक्षता बनाए रखना है। संजीव श्रीवास्तव चाहते तो किसी भी बड़े न्यूज़ चैनल में बतौर सलाहकार या प्रधान संपादक बैठकर करोड़ों का पैकेज ले सकते थे। वे चाहते तो सत्ता की ‘जी-हुज़ूरी’ कर सुख-सुविधाओं का आनंद ले सकते थे।

​लेकिन संजीव ने ‘बिकने’ के बजाय ‘बचना’ बेहतर समझा। उन्होंने महसूस किया कि अगर पत्रकारिता के मायने सिर्फ एजेंडा चलाना या नफरत के बाज़ार में नैरेटिव बेचना रह गया है, तो उस पेशे से दूरी बनाना ही बेहतर है। उन्होंने अपनी कलम की मर्यादा को बचाने के लिए उस सोने के पिंजरे को ठुकरा दिया जिसे दुनिया ‘सफलता’ कहती है।

​जयपुर की कचौड़ी: यह गिरावट नहीं, जीत का प्रतीक है

​जयपुर की गलियों में जब संजीव श्रीवास्तव अपनी छोटी सी दुकान पर कचौड़ी तलते हैं, तो कई लोग इसे ‘दौर की गिरावट’ मानते हैं। लेकिन हकीकत इसके उलट है। एक पत्रकार के लिए अपनी शर्तों पर जीना ही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

​”हर चमकती कुर्सी सफलता नहीं होती, और अपनी शर्तों पर जी गई सादगी भरी ज़िंदगी हार नहीं होती।”

​संजीव का यह कदम समाज को एक कड़ा संदेश देता है: काम कोई भी छोटा नहीं होता, बशर्ते वह ईमानदारी से किया जाए। एक ऐसी दुकान जहाँ वे खुद के मालिक हैं, उस दफ्तर से कहीं बेहतर है जहाँ ज़मीर को गिरवी रखकर खबरें लिखनी पड़ें।

​नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए एक जीवंत सबक

​संजीव श्रीवास्तव की कहानी आज के उन युवाओं के लिए एक आईना है जो पत्रकारिता को सिर्फ ग्लैमर और रसूख का जरिया मानते हैं। वे सिखाते हैं कि ‘ब्रैंड’ इंसान के पद से नहीं, उसके चरित्र से बनता है।

​अक्सर कहा जाता है कि पत्रकार समाज का दर्पण होता है, लेकिन जब दर्पण ही धुंधला हो जाए, तो समाज को सच कैसे दिखेगा? संजीव ने अपना ‘दर्पण’ साफ रखने के लिए प्रोफेशन बदल लिया, लेकिन अपनी साख पर आंच नहीं आने दी। उनकी यह सादगी और साहस आज सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय है, जहाँ लोग उन्हें ‘सच्चा नायक’ कह रहे हैं।

​निष्कर्ष: क्या पद ही सम्मान की कसौटी है?

​दुनिया में पद और कुर्सियाँ तो आती-जाती रहती हैं, लेकिन एक ‘पाकीज़ा चरित्र’ और बेखौफ़ साहस कमाना हर किसी के बस की बात नहीं होती। संजीव श्रीवास्तव ने साबित कर दिया है कि एक इंसान की गरिमा उसके काम की प्रकृति से नहीं, बल्कि उसके काम करने के पीछे की नीयत से तय होती है।

​आज वे गुलाबी नगरी में कचौड़ी तलकर न केवल अपना जीवन यापन कर रहे हैं, बल्कि उन हज़ारों लोगों को प्रेरित कर रहे हैं जो व्यवस्था के दबाव में घुट रहे हैं। उनका यह ‘ज़मीर का चुनाव’ उन्हें पत्रकारिता के इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर गया है।

पाठकों के लिए एक सवाल:

​क्या आपको लगता है कि आज के दौर में अपने उसूलों के लिए एक सफल करियर का त्याग करना सही फैसला है? क्या आप संजीव श्रीवास्तव के इस ‘साहसी चुनाव’ का सम्मान करते हैं? अपनी राय हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।