
ज्ञानपुर (भदोही): भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के इतिहास में कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिनका फैसला आने में दशकों लग जाते हैं। एक ऐसा ही मामला, जो पूर्व सांसद और ‘बैंडिट क्वीन’ के नाम से मशहूर फूलन देवी से जुड़ा था, अंततः अपने तार्किक निष्कर्ष पर पहुंच गया है। भदोही जिले के ज्ञानपुर स्थित अपर सिविल जज जूनियर डिवीजन (द्वितीय) की अदालत ने 25 साल पुराने एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 10 लोगों को आरोप मुक्त कर दिया है।
यह मामला साल 1998 का है, जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में भारी उथल-पुथल मची थी। तत्कालीन समाजवादी पार्टी की सांसद फूलन देवी के नेतृत्व में हुए एक आंदोलन और चक्काजाम को लेकर यह पूरी कानूनी लड़ाई लड़ी गई। आइए जानते हैं कि आखिर वह क्या घटना थी, जिसने फूलन देवी सहित 17 लोगों को कोर्ट के चक्कर लगाने पर मजबूर कर दिया था।
: क्या था 1998 का पूरा मामला?
बात साल 1998 की है, जब कुशीनगर के रामकोला चीनी मिल पर गन्ना किसानों का आंदोलन चल रहा था। किसान अपनी मांगों को लेकर अड़े थे और समाजवादी पार्टी (सपा) के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव किसानों को समर्थन देने के लिए वहां जा रहे थे।
प्रशासन ने कानून-व्यवस्था का हवाला देकर मुलायम सिंह यादव को रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी की खबर जैसे ही आग की तरह फैली, पूरे प्रदेश में सपा कार्यकर्ता आक्रोशित हो उठे। भदोही में भी इसका व्यापक असर देखने को मिला।
औराई विधानसभा क्षेत्र के माधोसिंह तिराहे पर सपा कार्यकर्ताओं ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, इस प्रदर्शन का नेतृत्व तत्कालीन सांसद फूलन देवी कर रही थीं। कार्यकर्ताओं ने वाराणसी-प्रयागराज नेशनल हाईवे को पूरी तरह जाम कर दिया, जिससे यातायात घंटों बाधित रहा। पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए फूलन देवी सहित 17 नामजद लोगों के खिलाफ औराई कोतवाली में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की थी।
: फूलन देवी की मौत और कानूनी पेचीदगियां
इस मामले की विवेचना के बाद पुलिस ने कोर्ट में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया। कानूनी प्रक्रिया चल ही रही थी कि 25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली में फूलन देवी की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
फूलन देवी की मौत के बाद, उनके खिलाफ चल रहे मामले को स्वाभाविक रूप से बंद कर दिया गया। लेकिन अन्य आरोपियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रही। कोर्ट की लंबी कार्यवाही के दौरान, समय का पहिया घूमता रहा। इन 25 सालों में, कुल 17 नामजद आरोपियों में से पूर्व सांसद फूलन देवी सहित सात लोगों की मौत हो चुकी है।
इसके अलावा, कोर्ट के आदेश पर एक अन्य व्यक्ति की फाइल को मुख्य मामले से अलग कर दिया गया था। अंततः, केवल 10 आरोपी ही शेष बचे थे, जिन पर मुकदमे की सुनवाई चल रही थी।
: साक्ष्यों के अभाव में न्याय: न्यायाधीश शशि किरन का फैसला
सोमवार को, अपर सिविल जज जूनियर डिवीजन (द्वितीय) न्यायाधीश शशि किरन की अदालत ने इस बहुचर्चित मामले पर अपना अंतिम फैसला सुनाया। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और उपलब्ध सबूतों का बारीकी से अध्ययन किया।
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष इन 10 आरोपियों के खिलाफ चक्काजाम में शामिल होने और कानून तोड़ने के ठोस सबूत पेश करने में असफल रहा। गवाहों के बयानों और पुलिस की चार्जशीट में कई खामियां थीं।
”साक्ष्यों के अभाव में” (Benefit of doubt), न्यायाधीश शशि किरन ने शेष बचे सभी 10 आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया। यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया, जो पिछले ढाई दशकों से अदालत की तारीखों और कानूनी प्रक्रिया का बोझ उठा रहे थे।
: कौन-कौन हुए आरोप मुक्त?
न्यायालय के इस फैसले से आरोप मुक्त होने वालों में समाजवादी पार्टी के कई तत्कालीन दिग्गज नेता और पदाधिकारी शामिल हैं। इनमें प्रमुख नाम हैं:
- अकबाल बहादुर सिंह उर्फ अटकोटी सिंह: तत्कालीन सपा जिला पंचायत उपाध्यक्ष।
- ओम प्रकाश यादव: तत्कालीन जिला महासचिव, सपा।
- दिनेश कुमार सिंह: पूर्व प्रमुख, ज्ञानपुर।
- हरिशंकर यादव
- छोटेलाल यादव
- एबरार अहमद
- एकराम अहमद
- अमिरूल्लाह
- नन्हे
- रमजान अली
इन सभी नेताओं के लिए यह फैसला एक राजनीतिक और व्यक्तिगत जीत की तरह है, क्योंकि यह मामला लंबे समय तक उनके सार्वजनिक जीवन पर एक साये की तरह मंडराता रहा।
: भारतीय न्याय व्यवस्था की सुस्त रफ़्तार और एक अध्याय का अंत
फूलन देवी चक्काजाम मामले का यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था की दोतरफा तस्वीर पेश करता है। एक तरफ, यह स्थापित करता है कि न्याय भले ही देर से मिले, लेकिन ठोस सबूतों के बिना किसी को सजा नहीं दी जा सकती। दूसरी तरफ, 25 साल का लंबा समय यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या इतनी देरी से मिला न्याय वास्तव में न्याय है?



