आगरा। ताजनगरी की फिजाओं में जब बसंत की खुशबू घुलती है, तो वह केवल प्रकृति का उत्सव नहीं, बल्कि शब्दों और सुरों का महाकुंभ बन जाती है। कुछ ऐसा ही नजारा आगरा के प्रसिद्ध ‘शीरोज हैंगआउट कैफे’ में देखने को मिला, जहाँ साझी विरासत के दो महान स्तंभों—जनकवि नजीर अकबराबादी और राष्ट्रकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’—की स्मृतियों को एक मंच पर पिरोया गया। अवसर था बसंत पर्व का, लेकिन इस बार इसमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस की राष्ट्रभक्ति का रंग भी शामिल था।​

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तीन घंटे से अधिक चले इस संगीतमय और साहित्यिक विमर्श ने न केवल दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि साहित्य ही वह धुरी है जो समाज के विवेक को सुरक्षित रखती है।​

“निराला-नजीर रहेंगे, तो बचेगा देश का साहित्यिक विवेक”​

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और आगरा के पुलिस आयुक्त दीपक कुमार ने अपने संबोधन में गहरी वैचारिक छाप छोड़ी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अगर निराला और नजीर जिंदा रहेंगे, तो भारत का साहित्यिक विवेक और देश की आत्मा सुरक्षित रहेगी।” उन्होंने नजीर अकबराबादी को आगरा की असली पहचान बताते हुए कहा कि उनकी नज्में और गजलें जनभाषा का वह पुल हैं, जो आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही जाती हैं। वहीं, महाप्राण निराला के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि छायावाद के शिखर पुरुष होने के बावजूद निराला ने हमेशा आम जनमानस की पीड़ा और संघर्ष को अपनी लेखनी का आधार बनाया।

​बसंत पर राष्ट्रवाद और काव्य का अनूठा संगम

यह आयोजन केवल कविताओं तक सीमित नहीं था। चूँकि यह अवसर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती का भी था, इसलिए कार्यक्रम में देशभक्ति का ज्वार भी उमड़ा। जब मंच से आजाद हिंद फौज का प्रसिद्ध तराना “कदम-कदम बढ़ाए जा” गूंजा, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट और जोश से भर गया।

​ज्ञात हो कि यह कालजयी गीत वंशीधर शुक्ल द्वारा रचित है और कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने इसे संगीतबद्ध किया था। आज भी भारतीय सेना के मार्च में इस धुन का उपयोग किया जाता है, जो हर भारतीय के रोंगटे खड़े कर देता है।​

सुरों की सरिता: सुधीर नारायण की भावपूर्ण प्रस्तुतियां​

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साहित्य की इस शाम को सुरों से सजाने का काम किया प्रख्यात गायक और बेगम अख्तर पुरस्कार से सम्मानित सुधीर नारायण ने। अमृता विद्या – एजुकेशन फॉर इम्मोर्टालिटी सोसायटी और छांव फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित इस सत्र में उन्होंने निराला की प्रसिद्ध रचना “सखी बसंत आया” को राग रागेश्वरी में गाकर बसंत का जीवंत चित्र खींच दिया।

​कार्यक्रम में नजीर की कालजयी कृतियों जैसे— “बंजारा नामा” (जब लाद चलेगा बंजारा) और कृष्ण भक्ति पर आधारित “क्या-क्या कहूँ मैं कृष्ण कन्हैया का बालपन” की प्रस्तुतियों ने यह साबित कर दिया कि नजीर केवल मुस्लिमों के नहीं, बल्कि पूरे लोकमानस के कवि थे। उनके साथ मंच पर खुशी सोनी, हर्षित पाठक और अमन शर्मा जैसे कलाकारों ने भी अपनी कला का जादू बिखेरा।​

शीरोज हैंगआउट: संघर्ष और साहित्य की जुगलबंदी

इस कार्यक्रम का स्थल ‘शीरोज हैंगआउट कैफे’ अपने आप में एक प्रेरणा है। यहाँ काम करने वाली एसिड अटैक सर्वाइवर्स के संघर्ष को साहित्य के साथ जोड़ते हुए छांव फाउंडेशन के डायरेक्टर आशीष शुक्ला ने बताया कि ऐसे आयोजनों से इन बेटियों में नई ऊर्जा का संचार होता है। आज यहाँ की बेटियां, जैसे रुकैया, स्वयं कविताएं लिख रही हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि साहित्य घावों को भरने की शक्ति रखता है।​

नजीर के नाम होगा मेट्रो स्टेशन?​

कार्यक्रम के दौरान एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी पारित किया गया। आगरा की जनता और साहित्यकारों ने मांग की कि ताजमहल मेट्रो स्टेशन या उसके आसपास के किसी स्टेशन का नाम जनकवि नजीर अकबराबादी के नाम पर रखा जाए। इस प्रस्ताव को जल्द ही शासन और जनप्रतिनिधियों को भेजा जाएगा। इसके अतिरिक्त, नजीर के जीवन पर आधारित एक बहुभाषी फिल्म का प्रोमो भी दिखाया गया, जिसकी शूटिंग जल्द शुरू होने वाली है।​

​आगरा में आयोजित यह ‘निराला-नजीर’ महोत्सव केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इस शहर की उस ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का उत्सव था, जिसे आज सहेजने की सबसे अधिक जरूरत है। जब तक नजीर के ‘बंजारा नामा’ की गूंज और निराला की ‘वीणा वादिनी’ की प्रार्थना हमारे बीच है, हमारी सांस्कृतिक जड़ें मजबूत रहेंगी।