लोरियापट्टी गांव में भटककर आए नर सांभर को सुरक्षित निकाला गया; चिकित्सा उपचार के बाद प्राकृतिक आवास में दी गई सुरक्षित विदाई

मथुरा। उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के गोवर्धन रेंज स्थित लोरियापट्टी गांव में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब ग्रामीणों ने एक विशालकाय नर सांभर हिरण को गलियों में घूमते देखा। वन्यजीव के गांव में प्रवेश से स्थानीय निवासियों में चिंता और कौतूहल का माहौल बन गया। हालांकि, ग्रामीणों की सूझबूझ और वन विभाग के साथ वाइल्डलाइफ एसओएस (Wildlife SOS) की त्वरित कार्रवाई से एक बड़े हादसे को टालते हुए हिरण को सुरक्षित बचा लिया गया।

घटना का विवरण और रेस्क्यू ऑपरेशन

जैसे ही ग्रामीणों ने सांभर को देखा, उन्होंने तुरंत इसकी सूचना वन विभाग को दी। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए, वन विभाग ने वाइल्डलाइफ एसओएस की ‘रैपिड रिस्पांस यूनिट’ से संपर्क किया। बिना समय गंवाए, एक विशेषज्ञ पशु चिकित्सक और प्रशिक्षित बचावकर्मियों सहित छह सदस्यीय टीम मौके पर पहुंची।

टीम ने सूझबूझ से काम लेते हुए हिरण को सुरक्षित रूप से पकड़ा। शुरुआती जांच में पाया गया कि सांभर काफी थका हुआ था और उसके शरीर के पिछले हिस्से में खरोंचें थीं। टीम ने तुरंत प्राथमिक उपचार दिया और स्थिति स्थिर होने के बाद उसे सुरक्षित रूप से उसके प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ दिया।

अधिकारियों और विशेषज्ञों का क्या कहना है?

मथुरा के डीएफओ, वेंकट श्रीकर पटेल (IFS) ने इस सफल ऑपरेशन की सराहना करते हुए कहा: “ग्रामीणों द्वारा समय पर दी गई सूचना ने इस रेस्क्यू को सफल बनाया। वन विभाग और वाइल्डलाइफ एसओएस के बीच ऐसा तालमेल मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए बेहद जरूरी है।

” वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक और सीईओ, कार्तिक सत्यनारायण ने बताया कि स्थानीय लोगों की जागरूकता वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है। वहीं, डॉ. इलयाराजा एस (उप निदेशक, पशु चिकित्सा सेवा) ने पुष्टि की कि जानवर तनाव में था, लेकिन मौके पर मिले इलाज से उसे राहत मिली।

बैजूराज एम.वी. (डायरेक्टर कंजर्वेशन प्रोजेक्ट्स) के अनुसार, जंगलों के सिमटने और भोजन-पानी की तलाश में अक्सर ये जीव रिहायशी इलाकों की तरफ रुख कर लेते हैं, ऐसे में इन्हें सुरक्षित वातावरण देना हमारी प्राथमिकता है।

सांभर हिरण का संरक्षण महत्व

सांभर हिरण (Rusa unicolor) भारत की सबसे बड़ी हिरण प्रजातियों में से एक है। इसे ‘वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972’ के तहत सुरक्षा प्राप्त है और IUCN की रेड लिस्ट में इसे ‘वल्नरेबल’ (Vulnerable) श्रेणी में रखा गया है।