गाजियाबाद की ‘राज एंपायर सोसाइटी’ इन दिनों एक ऐसी खामोश जंग की गवाह बनी हुई है, जिसने पूरे देश के दिल को झकझोर कर रख दिया है। यह कहानी है 31 साल के हरीश राणा की, जो पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर बेजान पड़े हैं। लेकिन इस दुखद दास्तां में तब एक नया अध्याय जुड़ा, जब राजस्थान के भीलवाड़ा से एक 62 वर्षीय बुजुर्ग, अखंडानंद बाबा, उम्मीद की एक पोटली लेकर गाजियाबाद पहुंचे। बाबा का दावा है कि उनकी जड़ी-बूटियों में वह दम है जो हरीश की सुप्त नसों में फिर से जान फूंक सकता है।

​उम्मीद और बेबसी के बीच आमना-सामना

​अखंडानंद बाबा जब गाजियाबाद की उस सोसाइटी के गेट पर पहुंचे जहाँ हरीश का परिवार रहता है, तो सुरक्षा गार्डों ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। बाबा ने हार नहीं मानी और किसी तरह हरीश के पिता, अशोक राणा तक अपना संदेश पहुँचाया। 13वीं मंजिल पर रहने वाले पिता, जो पिछले एक दशक से अपने बेटे की पलकें झपकने का इंतजार कर रहे हैं, नीचे आए।

​सोसाइटी के गेट पर ही दोनों के बीच बातचीत हुई। बाबा ने पूरे विश्वास के साथ कहा, “एक बार मेरी जड़ी-बूटियों का उपयोग करके देखें, चमत्कार हो सकता है। मैं अपनी दवाओं की जांच AIIMS के डॉक्टरों से कराने को भी तैयार हूँ।” अशोक राणा ने बाबा की बातों को शांति से सुना, लेकिन उनकी आँखों में वह चमक नहीं थी जो किसी उम्मीद को देखकर आती है। उन्होंने बाबा को फल और दान देकर ससम्मान विदा किया और भारी मन से कहा, “अब बहुत देर हो चुकी है, हमने सब आजमा लिया।”

​इंजीनियरिंग के छात्र से ‘लिविंग डेड’ तक का सफर

​हरीश राणा की कहानी किसी भी माता-पिता के लिए एक बुरे सपने जैसी है। साल 2013 में हरीश चंडीगढ़ के एक कॉलेज से इंजीनियरिंग के अंतिम सेमेस्टर की पढ़ाई कर रहे थे। एक दिन पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उनके सिर में गंभीर चोट आई। वह हादसा हरीश को कोमा के उस अंधेरे गलियारे में ले गया, जहाँ से वह आज तक वापस नहीं आ पाए।

​दिल्ली के नामी होटलों में शेफ रह चुके अशोक राणा ने बेटे के इलाज के लिए अपना तीन मंजिला मकान तक बेच दिया। आज वह परिवार की गुजर-बसर के लिए सड़कों पर सैंडविच और बर्गर बेचते हैं। गाजियाबाद की इस सोसाइटी में वे केवल अपने बेटे को सम्मानजनक विदाई देने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

​सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘पैसिव यूथेनेशिया’

​हाल ही में भारत के कानूनी इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में ‘इच्छामृत्यु’ (Passive Euthanasia) की अनुमति दी है। अदालत ने माना कि 13 साल से लाइफ सपोर्ट पर पड़े व्यक्ति के लिए यह स्थिति गरिमापूर्ण नहीं है। कोर्ट ने दिल्ली एम्स को निर्देश दिया है कि एक ऐसी योजना तैयार की जाए जिससे हरीश का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सके, ताकि उनकी मृत्यु के दौरान मानवीय गरिमा और सम्मान बना रहे। साथ ही, केंद्र सरकार से इस संवेदनशील विषय पर व्यापक कानून बनाने पर विचार करने को भी कहा है।

​जाते-जाते 5 जिंदगियां रोशन कर सकते हैं हरीश

​हरीश राणा भले ही खुद अपनी जिंदगी की जंग हार गए हों, लेकिन वह जाते-जाते दूसरों के लिए ‘मसीहा’ बन सकते हैं। डॉक्टरों के अनुसार, इच्छामृत्यु की प्रक्रिया के दौरान हरीश के जो अंग अब भी कार्य कर रहे हैं, उन्हें डोनेट किया जा सकता है। हरीश का लिवर, फेफड़े और आंखों की कॉर्निया कम से कम चार लोगों को नया जीवन दे सकती है। यदि उनके हृदय की स्थिति स्थिर पाई जाती है, तो एक और परिवार के घर का चिराग रोशन हो सकता है।

​चमत्कार बनाम विज्ञान: एक अंतहीन बहस

​अखंडानंद बाबा जैसे लोगों का दावा अक्सर विज्ञान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, लेकिन यह समाज में मौजूद उस अटूट विश्वास को दर्शाता है जहाँ लोग मौत के मुहाने पर भी ‘चमत्कार’ की आस नहीं छोड़ते। हालांकि, हरीश के पिता के लिए यह अब केवल एक भावनात्मक बोझ है। वह जानते हैं कि 13 साल का लंबा वक्त और डॉक्टरों की रिपोर्ट किसी भी जड़ी-बूटी के दावे से कहीं अधिक कड़वी सच्चाई बयान करती है।

​निष्कर्ष (Conclusion)

​हरीश राणा का मामला केवल एक मेडिकल केस नहीं है, बल्कि यह पिता के त्याग, एक परिवार के धैर्य और भारत की न्याय व्यवस्था के बदलते स्वरूप की कहानी है। राजस्थान से आए बाबा का दावा भले ही अशोक राणा ने स्वीकार न किया हो, लेकिन इसने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या विज्ञान की सीमाओं के परे भी कोई रास्ता है, या फिर गरिमापूर्ण विदाई ही सबसे बड़ा उपचार है।

पाठकों के लिए प्रश्न: क्या आपको लगता है कि भारत में इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को लेकर और अधिक स्पष्ट कानून होने चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।