
क्या ई-टेंडरिंग से खत्म हो गई कमीशनखोरी? टेंडर आवंटन और जमीनी हकीकत का एक विस्तृत विश्लेषण
नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश:- किसी भी सरकारी परियोजना, चाहे वह सड़क निर्माण हो या भवनों का रखरखाव, उसके लिए ‘टेंडर’ (Tender) प्रक्रिया एक अनिवार्य हिस्सा है। सैद्धांतिक रूप से यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर ‘ठेकेदार कमीशन’ और ‘पूलिंग’ जैसे शब्द आज भी चर्चा में रहते हैं। वर्ष 2026 में डिजिटल सुधारों के बावजूद, यह समझना जरूरी है कि यह सिस्टम कैसे काम करता है और इसमें खामियां कहां हैं।
1. सरकारी टेंडर प्रक्रिया क्या है? (The Tendering Process)
सरकारी विभागों में किसी भी कार्य को निष्पादित करने के लिए निजी कंपनियों या व्यक्तियों से प्रस्ताव मांगे जाते हैं, जिसे टेंडर कहते हैं। इसकी मुख्य प्रक्रिया इस प्रकार है:
NIT (Notice Inviting Tender): विभाग समाचार पत्रों और पोर्टल पर टेंडर नोटिस जारी करता है।
Technical Bid:
इसमें ठेकेदार की योग्यता, अनुभव और मशीनरी की जांच की जाती है।
Financial Bid:
यहाँ सबसे कम बोली (L1) लगाने वाले को प्राथमिकता दी जाती है।
2. ई-टेंडरिंग (E-Tendering): पारदर्शिता की ओर एक कदम
भ्रष्टाचार को कम करने के लिए भारत सरकार ने अब लगभग सभी विभागों में ई-टेंडरिंग अनिवार्य कर दी है।
फायदे: अब ठेकेदार को विभाग के चक्कर नहीं लगाने पड़ते, वे घर बैठे ऑनलाइन बोली लगा सकते हैं।
सुधार: इससे टेंडर डालने के दौरान होने वाली फिजिकल दादागिरी (Mafia elements) पर लगाम लगी है।
3. ठेकेदार कमीशन का मायाजाल: एक कड़वा सचडिजिटल प्रणाली के बावजूद, सरकारी गलियारों में ‘कमीशन’ की चर्चा खत्म नहीं हुई है। अक्सर यह देखा जाता है कि टेंडर मिलने से लेकर बिल पास होने तक, विभिन्न स्तरों पर एक निश्चित प्रतिशत (Percentage) की मांग की जाती है।
फिक्स्ड कमीशन: कई मामलों में यह आरोप लगते हैं कि प्रोजेक्ट लागत का 5% से 25% तक हिस्सा ‘सुविधा शुल्क’ के रूप में बंट जाता है।
गुणवत्ता से समझौता: जब ठेकेदार को कमीशन देना पड़ता है, तो वह उसकी भरपाई सामग्री की गुणवत्ता (Quality) कम करके करता है। यही कारण है कि नई बनी सड़कें पहली बारिश में ही टूट जाती हैं।
4. ‘टेंडर पूलिंग’ और सांठगांठ (Collusion)
भ्रष्टाचार का एक नया तरीका ‘पूलिंग’ है। इसमें कुछ बड़े ठेकेदार आपस में मिल जाते हैं और तय कर लेते हैं कि इस बार टेंडर किसे मिलेगा। वे जानबूझकर ऐसी बोलियां लगाते हैं जिससे एक विशेष व्यक्ति को ही काम मिले। इससे सरकार को मिलने वाला प्रतिस्पर्धी लाभ खत्म हो जाता है।
5. 2026 में सुधार के उपाय और नई चुनौतियां
सरकार ने अब ‘ब्लॉकचेन रिकॉर्ड्स’ और ‘थर्ड पार्टी ऑडिट’ को बढ़ावा देना शुरू किया है।
GeM पोर्टल: छोटे टेंडर्स के लिए GeM (Government e-Marketplace) ने बिचौलियों को पूरी तरह हटा दिया है।
सख्त मॉनिटरिंग: अब ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी के जरिए सड़क और निर्माण कार्यों की लाइव प्रगति देखी जाती है, जिससे फर्जी बिलिंग पर रोक लग सके।
निष्कर्ष सरकारी टेंडर प्रक्रिया में तकनीक ने पारदर्शिता तो बढ़ाई है, लेकिन मानवीय हस्तक्षेप और ‘सिस्टम की सेटिंग’ को पूरी तरह खत्म करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। जब तक विभागों में जवाबदेही (Accountability) और ठेकेदारों के लिए कड़े दंड का प्रावधान नहीं होगा, तब तक ‘कमीशन’ का यह खेल विकास की गति को बाधित करता रहेगा।
क्या आपको लगता है कि ई-टेंडरिंग से ठेकेदारों की मनमानी कम हुई है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार साझा करें।




