
आगरा। मनोरंजन जगत और विवादों का चोली-दामन का साथ रहा है, लेकिन जब बात धार्मिक आस्था और सामाजिक सम्मान की आती है, तो विरोध की ज्वाला भड़कना लाजिमी है। ताजनगरी आगरा में इन दिनों फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ को लेकर माहौल बेहद गर्माया हुआ है। फिल्म के शीर्षक और उसके कथानक को लेकर ब्राह्मण समाज ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। शनिवार को आगरा के प्रसिद्ध परशुराम चौक पर जो नजारा दिखा, उसने प्रशासन और फिल्मकारों की चिंता बढ़ा दी है।
शंखनाद के साथ युद्ध का आगाज: अर्धनग्न होकर जताया विरोध
आगरा के परशुराम चौक पर सुबह से ही भारी संख्या में ब्राह्मण समाज के लोग जुटने लगे थे। विरोध का तरीका इस बार बेहद आक्रामक और प्रतीकात्मक था। समाज के कई युवा और बुजुर्ग अर्धनग्न अवस्था में नजर आए, जिन्होंने अपनी चोटियां खोलकर और हाथों में शंख लेकर फिल्म निर्माता नीरज पांडे के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि शंख बजाकर उन्होंने इस ‘अन्याय’ के खिलाफ युद्ध का शंखनाद कर दिया है। हवा में गूंजते ‘हर-हर महादेव’ और ‘सनातन धर्म की जय’ के नारों के बीच प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया कि वे अपनी अस्मिता के साथ कोई खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेंगे।
“नाम बदलो या रिलीज डेट भूलो” – समाज की कड़ी चेतावनी
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे ब्राह्मण समाज के प्रतिनिधि मदन मोहन ने कड़े शब्दों में सरकार और प्रशासन को चेतावनी दी। उन्होंने कहा, “यह प्रदर्शन तो बस एक झांकी है। अभी हम शांतिपूर्ण तरीके से अर्धनग्न होकर अपनी बात रख रहे हैं, लेकिन अगर फिल्म का नाम नहीं बदला गया या इसे जबरन रिलीज करने की कोशिश की गई, तो पूरा समाज सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करेगा।”
समाज की मांग स्पष्ट है—या तो फिल्म का नाम पूरी तरह बदला जाए, अन्यथा इसकी रिलीज पर स्थायी रोक लगाई जाए। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों को अनसुना किया गया, तो वे फिल्म निर्माता के खिलाफ कानूनी मुकदमा भी दर्ज कराएंगे।
आखिर क्या है ‘घूसखोर पंडत’ विवाद की असली वजह?
फिल्म को लेकर विवाद की जड़ इसके शीर्षक और उसमें दिखाए गए चित्रण में है। बताया जा रहा है कि फिल्म में एक ऐसे पात्र को केंद्र में रखा गया है जो धार्मिक वेशभूषा धारण करता है लेकिन भ्रष्ट गतिविधियों में लिप्त है। ब्राह्मण समाज का आरोप है कि ‘पंडित’ शब्द के साथ ‘घूसखोर’ विशेषण जोड़ना न केवल अपमानजनक है, बल्कि यह पूरे समुदाय की छवि को धूमिल करने की एक सोची-समझी साजिश है।समाज के बुद्धिजीवियों का तर्क है कि बॉलीवुड अक्सर एक विशेष वर्ग और सनातन धर्म को निशाना बनाता रहा है। उनके अनुसार, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी की आस्था और सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना न्यायसंगत नहीं है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से आस और अदालती कार्यवाही की तैयारी
आगरा में हुए इस प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी जिक्र किया। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि इस गंभीर मामले का संज्ञान मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा लिया गया है। उन्हें उम्मीद है कि ‘महाराज जी’ के रहते सनातन धर्म का अपमान नहीं होने दिया जाएगा।
साथ ही, समाज के लोगों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे केवल सड़क पर ही नहीं, बल्कि न्याय के मंदिर में भी इस लड़ाई को लड़ेंगे। जरूरत पड़ने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी पूरी कर ली गई है। उनका कहना है कि कुछ लोग आपसी विवाद पैदा कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे सफल नहीं होने दिया जाएगा।
UGC और अन्य ज्वलंत मुद्दों पर भी बरसे प्रदर्शनकारी
दिलचस्प बात यह रही कि इस प्रदर्शन में केवल फिल्म का ही विरोध नहीं हुआ, बल्कि समाज ने शिक्षा और अन्य नीतिगत मुद्दों पर भी अपनी राय रखी। प्रदर्शनकारियों ने UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) से जुड़े कुछ हालिया विवादों पर भी अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का स्वागत किया जिसमें संबंधित विवादित बिल पर रोक लगाई गई है। समाज का मानना है कि चाहे शिक्षा हो या मनोरंजन, हर जगह सनातन मूल्यों की रक्षा होनी चाहिए।
आगरा का यह प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि अब समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर पहले से कहीं अधिक सजग है। ‘घूसखोर पंडत’ फिल्म को लेकर उठा यह बवंडर अब केवल आगरा तक सीमित नहीं रहने वाला है। फिल्म मेकर नीरज पांडे के लिए आने वाले दिन चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं, क्योंकि एक तरफ फिल्म की रिलीज का दबाव है और दूसरी तरफ एक बड़े वर्ग की आहत भावनाएं। अब देखना यह होगा कि सेंसर बोर्ड और सरकार इस संवेदनशील मामले में क्या रुख अपनाते हैं।



