दो साल पहले उत्तराखंड के जंगलों से एक ऐसी खबर आई जिसने वन्यजीव प्रेमियों का दिल दहला दिया था। एक तेज रफ्तार ट्रेन की चपेट में आने से न केवल एक हथिनी की मौत हुई, बल्कि उसकी 9 महीने की मासूम बच्ची भी गंभीर रूप से घायल होकर पटरी के किनारे अधमरी स्थिति में पड़ी मिली। आज वही बच्ची, जिसे दुनिया ‘बानी’ के नाम से जानती है, न केवल जीवित है बल्कि उपचार और जिजीविषा की एक ऐसी मिसाल बन चुकी है जिसे देख डॉक्टर भी इसे ‘चमत्कार’ कह रहे हैं। मथुरा स्थित वाइल्डलाइफ एसओएस (Wildlife SOS) के हाथी अस्पताल में बानी ने अपने सफल उपचार के दो साल पूरे कर लिए हैं।

​दर्दनाक अतीत: जब बानी के पैरों से छिन गई थी हरकत​

दिसंबर की वह रात बानी के लिए किसी काल से कम नहीं थी। ट्रेन की टक्कर इतनी जोरदार थी कि बानी के शरीर का पिछला हिस्सा पूरी तरह लकवाग्रस्त (Paralyzed) हो गया था। अपनी माँ को खोने के गम और असहनीय शारीरिक पीड़ा के बीच, बानी के जीवित बचने की उम्मीद न के बराबर थी। लेकिन उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के वन विभागों की मुस्तैदी ने उसे एक नई जिंदगी की ओर मोड़ दिया। उसे एम्बुलेंस के जरिए मथुरा लाया गया, जो उसके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

आधुनिक चिकित्सा और संकल्प: कैसे हुआ यह चमत्कार?​

जब बानी को मथुरा लाया गया था, वह अपने पैरों पर खड़ी तक नहीं हो सकती थी। वाइल्डलाइफ एसओएस की पशु चिकित्सा टीम ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक व्यापक ‘रिहैबिलिटेशन प्लान’ तैयार किया।

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​डॉक्टरों ने पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा का एक अनूठा संगम अपनाया। बानी के इलाज में एक्यूपंक्चर (Acupuncture) का प्रयोग किया गया, जो भारत में किसी हाथी पर पहली बार इतनी गहनता से आजमाया गया था। इसके साथ ही:​

लेजर थेरेपी: ऊतकों की मरम्मत के लिए।​

हाइड्रोथेरेपी: पानी में व्यायाम ताकि पैरों की मांसपेशियों पर दबाव कम पड़े।​

आयुर्वेदिक मालिश: रक्त संचार बढ़ाने के लिए जड़ी-बूटियों के तेल का उपयोग।

​विशेष आहार: हड्डियों की मजबूती के लिए विशेष सप्लीमेंट्स।

​आज परिणाम सबके सामने है—बानी अब बिना किसी बाहरी सहारे के खड़ी हो सकती है। हालांकि वह अभी भी अपने पैरों को थोड़ा घसीटकर चलती है, लेकिन उसकी प्रगति ने विज्ञान की सीमाओं को चुनौती दी है।​

खास सुरक्षा और लाड़-प्यार: सर्दियों में वीआईपी ट्रीटमेंट​

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बानी की रिकवरी में उसकी शारीरिक चिकित्सा के साथ-साथ उसके मानसिक स्वास्थ्य का भी पूरा ख्याल रखा गया है। उसके बाड़े को एक खेल के मैदान की तरह विकसित किया गया है, जहाँ खरोंचने के लिए प्राकृतिक पेड़ और दिमाग को सक्रिय रखने के लिए ‘रोलर-ड्रम फीडर’ लगाए गए हैं।​

चूंकि बानी की चोटें पुरानी हैं, इसलिए ठंड का मौसम उसके लिए चुनौतीपूर्ण होता है। सर्दियों में उसे ऊनी तिरपाल की जैकेट पहनाई जाती है और उसके बाड़े में रात भर ‘हेलोजन लाइट’ जलाई जाती है ताकि तापमान नियंत्रित रहे। उसके पैरों की सुरक्षा के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए जूते बनाए गए हैं, जो चलते समय उसके तलवों को चोट लगने से बचाते हैं।​

जश्न का दिन: केक, फल और खुशियां​

उपचार के दो साल पूरे होने पर मथुरा हाथी अस्पताल में उत्सव जैसा माहौल था। बानी के लिए उसके पसंदीदा फलों—तरबूज, पपीता, अमरूद, केला और खजूर—से बना एक भव्य ‘फ्रूट केक’ तैयार किया गया। यह केवल एक भोजन नहीं था, बल्कि उन सैकड़ों लोगों की मेहनत का सम्मान था जिन्होंने बानी को दोबारा पैरों पर खड़ा देखने के लिए दिन-रात एक कर दिया।​

वाइल्डलाइफ एसओएस के सह-संस्थापक कार्तिक सत्यनारायण ने इस मौके पर एक गंभीर संदेश भी दिया। उन्होंने कहा, “बानी की कहानी हमें खुशी तो देती है, लेकिन यह उन भयावह रेल दुर्घटनाओं की याद भी दिलाती है जो हमारे हाथियों का अस्तित्व मिटा रही हैं। बानी तो बच गई, लेकिन उसकी माँ नहीं बची। हमें अपनी रेल पटरियों को हाथियों के लिए सुरक्षित बनाना ही होगा।”​

बानी केवल एक हथिनी नहीं, एक प्रेरणा है​बानी की रिकवरी इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि अगर इंसान अपनी करुणा और तकनीक का सही इस्तेमाल करे, तो प्रकृति के साथ हुए बड़े से बड़े अन्याय को सुधारा जा सकता है। आज बानी वाइल्डलाइफ एसओएस की सबसे लाड़ली सदस्य है और उसकी हर छोटी सी चहलकदमी संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी जीत मानी जाती है।