आगरा। ताजनगरी में चिलचिलाती धूप और बढ़ती गर्मी के बीच अभिभावकों के माथे पर चिंता की लकीरें सिर्फ मौसम की वजह से नहीं, बल्कि बच्चों के स्कूलों से मिलने वाली लंबी-चौड़ी डिमांड लिस्ट की वजह से हैं। आगरा के जिलाधिकारी (DM) ने पिछले दिनों निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए बेहद सख्त लहजे में निर्देश जारी किए थे। उन्होंने स्पष्ट किया था कि कोई भी स्कूल किसी खास दुकान से किताबें या ड्रेस खरीदने के लिए दबाव नहीं बनाएगा और न ही फीस के नाम पर अनुचित वसूली होगी। लेकिन हकीकत यह है कि सरकारी फाइलों और मीडिया बयानों के बीच स्कूल संचालकों की मनमानी का ‘सिंडिकेट’ जस का तस चल रहा है।

​कागजों पर छापेमारी, जमीन पर वसूली: कहाँ है प्रशासन का खौफ?

​शिक्षा विभाग द्वारा पिछले कुछ हफ्तों में कई स्कूलों में छापेमारी और जाँच के दावे किए गए। अखबारों की सुर्खियां बनीं कि दोषी स्कूलों पर कार्रवाई होगी, भारी जुर्माना लगेगा और उनकी मान्यता भी रद्द की जा सकती है। लेकिन अगर आप आगरा की सड़कों पर निकलें और स्कूलों के बाहर खड़े अभिभावकों से बात करें, तो कहानी कुछ और ही नजर आती है।

​अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल अब सीधे तौर पर दुकान का नाम बताने के बजाय ‘कोड वर्ड’ का इस्तेमाल कर रहे हैं। स्कूलों ने वेंडर तय कर रखे हैं जहाँ से ड्रेस और स्टेशनरी लेना एक “अघोषित अनिवार्यता” बन गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या शिक्षा विभाग की ये कार्यवाहियां महज एक दिखावा हैं या स्कूल संचालकों का रसूख प्रशासन के डर से कहीं ज्यादा बड़ा है?

​किताबों और ड्रेस के नाम पर ‘कमीशन का गणित’

​निजी स्कूलों ने इस बार लूट का एक नया तरीका निकाला है। कई स्कूलों ने अपनी किताबों के सेट में कुछ ऐसी कॉपियां और विशेष बाइंडिंग वाली किताबें जोड़ दी हैं जो शहर की किसी भी आम दुकान पर उपलब्ध नहीं हैं। अभिभावकों को मजबूरन उन्हीं दुकानों पर जाना पड़ता है जहाँ स्कूल का “कमीशन” सेट है।

​एक अभिभावक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “DM साहब ने कहा था कि कहीं से भी सामान ले सकते हैं, लेकिन जब हम दुकान पर जाते हैं तो पता चलता है कि स्कूल की विशिष्ट ड्रेस का कपड़ा और किताबों का सेट केवल एक ही चुनिंदा दुकान पर उपलब्ध है। यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें आम आदमी बुरी तरह फंसा हुआ है।”

​क्या केवल ‘नोटिस’ तक सिमट जाएगी कार्यवाही?

​जब भी कोई शिकायत बढ़ती है, शिक्षा विभाग आनन-फानन में एक जाँच कमेटी गठित कर देता है और संबंधित स्कूल को नोटिस जारी कर दिया जाता है। लेकिन क्या कभी किसी बड़े स्कूल की मान्यता वास्तव में रद्द हुई? आगरा के लोगों का मानना है कि विभाग और स्कूल प्रबंधन के बीच की “जुगलबंदी” इतनी मजबूत है कि आदेश केवल रस्म अदायगी बनकर रह जाते हैं। छापेमारी की सूचना अक्सर स्कूलों को पहले ही मिल जाती है, जिससे वे जाँच के समय सब कुछ ‘नियमों के अनुसार’ दिखाने में सफल हो जाते हैं।

​प्रशासन की चुप्पी और आम आदमी का दर्द

​जिलाधिकारी के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अगर स्कूल संचालकों के हौसले बुलंद हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र की विफलता को दर्शाता है। शिक्षा, जो कभी समाज सेवा का माध्यम थी, अब पूरी तरह से एक संगठित व्यापार बन चुकी है। आगरा के मध्यमवर्गीय परिवार अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं, लेकिन बदले में उन्हें केवल शोषण मिल रहा है।

​प्रशासन को चाहिए कि वे केवल नोटिस जारी करने के बजाय गुप्त रूप से (Dummy Customers) भेजकर इन दुकानों और स्कूलों की पड़ताल करें। जब तक दो-चार बड़े स्कूलों पर कठोर कानूनी कार्यवाही नहीं होगी, तब तक यह सिंडिकेट टूटने वाला नहीं है।

निष्कर्ष

​आगरा में शिक्षा के नाम पर चल रही यह लूट अब बर्दाश्त से बाहर होती जा रही है। जिलाधिकारी के आदेशों की धज्जियां उड़ाना यह दर्शाता है कि स्कूल संचालकों के मन में कानून का कोई सम्मान नहीं है। शिक्षा विभाग को अपनी कार्यशैली में पारदर्शिता लानी होगी और केवल कागजी घोड़े दौड़ाने के बजाय धरातल पर कड़े कदम उठाने होंगे।

पाठकों के लिए एक सवाल:

क्या आपको लगता है कि प्रशासन जानबूझकर स्कूलों को ढील दे रहा है, या विभाग के पास वास्तव में इन स्कूलों पर लगाम कसने की शक्ति नहीं है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।