
आगरा के नरीपुरा इलाके की गलियों में एक ऐसी सिसकी दबी हुई है, जो पिछले 14 सालों से सिस्टम और गरीबी की मार झेल रही है। यह कहानी है साजिया अब्बासी की, जिसकी जिंदगी का सफर शुरू होने से पहले ही चूहों ने उसे उम्र भर का जख्म दे दिया। ढाई महीने की मासूमियत में जब साजिया को अपनी मां की गोद की गर्माहट महसूस होनी चाहिए थी, तब चूहों ने उसके पैरों को अपना निवाला बना लिया। आज 14 साल बाद भी वह दर्द कम नहीं हुआ है, बल्कि नासूर बनकर उसकी रूह को छलनी कर रहा है।
ढाई महीने की उम्र और वो खौफनाक रात
घटना 14 साल पहले की है। भीमनगर बाड़े वाली गली के एक छोटे से मकान में रहने वाली मिसिया ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनके घर में मौजूद चूहे उनकी बेटी की किस्मत लिख देंगे। साजिया जब महज ढाई महीने की थी, तब एक रात चूहों ने उसके पैरों की एक-एक कर सभी अंगुलियां और अंगूठे कुतर डाले।
सबसे दर्दनाक बात यह थी कि साजिया का शरीर जन्म से ही कमर के नीचे सुन्न रहता था, जिसके कारण वह चूहों के काटने पर रो भी नहीं सकी। सुबह जब मां ने बिस्तर को खून से लथपथ देखा, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह मंजर आज भी मिसिया की आंखों में खौफ पैदा कर देता है।
गरीबी की बेड़ियां और अधूरा इलाज
साजिया के पिता एक दिहाड़ी मजदूर हैं और मां घरों में झाड़ू-पोछा करके किसी तरह परिवार का पेट पालती हैं। तीन बच्चों के इस परिवार के पास इतने संसाधन नहीं थे कि वे किसी बड़े निजी अस्पताल में साजिया का प्लास्टिक सर्जरी या विशेष इलाज करा पाते।
मिसिया बताती हैं कि उन्होंने हार नहीं मानी। वे बेटी को लेकर दिल्ली के एम्स (AIIMS) तक गईं, लेकिन वहां की लंबी कतारों और गरीबी के कारण उन्हें वो तवज्जो नहीं मिली, जिसकी साजिया को जरूरत थी। नतीजा यह हुआ कि वक्त बीतता गया, लेकिन घाव नहीं भरे।
संक्रमण और ‘कीड़ों’ के बीच कटती जिंदगी
साजिया अब 14 साल की हो चुकी है और सरकारी स्कूल में कक्षा पांच की छात्रा है। लेकिन उसकी स्कूल की वर्दी के नीचे छिपे पैर एक खौफनाक हकीकत बयां करते हैं। अंगुलियां न होने के कारण उन हिस्सों में अक्सर संक्रमण हो जाता है।
उसकी मां ने रुंधे गले से बताया, “बरसात के दिनों में स्थिति और भयावह हो जाती है। घावों में सूजन आ जाती है और कई बार उनमें कीड़े तक पड़ जाते हैं।” हालांकि कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न है, लेकिन जब संक्रमण हड्डियों तक पहुंचता है, तो वह असहनीय दर्द साजिया को रात भर सोने नहीं देता। एक मां के लिए अपनी औलाद को इस हालत में देखना किसी नरक से कम नहीं है।
जिलाधिकारी से लगाई मदद की गुहार: क्या जागेगा सिस्टम?
थक-हारकर और अपनी बेटी को तिल-तिल मरता देख, मिसिया शनिवार को आगरा के जिलाधिकारी अरविंद बंगारी के पास पहुंचीं। उन्होंने अपनी आपबीती सुनाई और बेटी के बेहतर इलाज के लिए गुहार लगाई। डीएम ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तुरंत संज्ञान लिया और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. अरुण श्रीवास्तव को जांच के निर्देश दिए हैं।
प्रशासन की ओर से आश्वासन तो मिला है, लेकिन सवाल वही है कि क्या 14 साल की देरी के बाद साजिया को वह इलाज मिल पाएगा, जिससे उसका संक्रमण रुक सके और वह एक गरिमामय जीवन जी सके?
निष्कर्ष: गरीबी और स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल
साजिया का मामला सिर्फ एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह हमारी सामाजिक और स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है। जिस उम्र में बच्चों के सपने पंख फैलाते हैं, वहां साजिया संक्रमण और दर्द से जूझ रही है। गरीबी की मार इतनी गहरी है कि एक मां को अपनी बेटी के पैर ठीक कराने के लिए 14 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा। अब सबकी नजरें प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर टिकी हैं कि वे इस बेबस परिवार की कितनी और कैसी मदद करते हैं।



