उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने सत्ता संभालते ही भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट और सख्त निर्देश दिए थे कि किसी भी सरकारी कार्यालय में कोई भी निजी या बाहरी व्यक्ति कार्य नहीं करेगा। विशेषकर राजस्व कार्यालयों, थानों और जन-सुविधा से जुड़े विभागों में दलालों और अनधिकृत लोगों का प्रवेश वर्जित किया गया था। लेकिन ताजनगरी आगरा में हकीकत इसके उलट है। यहाँ के प्रमुख सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग कर्मचारी महज ‘सहायक’ नहीं, बल्कि व्यवस्था का वह ‘अदृश्य हिस्सा’ बन चुके हैं, जिनके बिना सरकारी बाबू भी एक कदम आगे नहीं बढ़ते।​

नगर निगम से RTO तक: हर तरफ बिछा है आउटसोर्सिंग का जाल

​आगरा नगर निगम हो, आरटीओ (RTO) कार्यालय हो या फिर स्वास्थ्य विभाग—इन सभी संवेदनशील और महत्वपूर्ण विभागों में आउटसोर्सिंग कर्मचारी सालों से अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। सरकारी नियमावली के अनुसार, इन कर्मचारियों को केवल डाटा एंट्री या सामान्य सहायक कार्यों के लिए रखा गया था।

​हकीकत की पड़ताल करने पर पता चलता है कि यहाँ की मुख्य सीटों (पटलों) पर यही कर्मचारी काबिज हैं। सरकारी फाइलों का मूवमेंट तय करना हो, ऑनलाइन डेटा फीडिंग हो या सूचना का अधिकार (RTI) के तहत पूछे गए सवालों के जवाब तैयार करना—सब कुछ इन बाहरी हाथों में है। हालत यह है कि जनता जब अपने काम के लिए पहुँचती है, तो उन्हें स्थायी अधिकारी से ज्यादा इन ‘प्राइवेट साहबों’ की मिन्नतें करनी पड़ती हैं।​

गोपनीयता और सरकारी निजता पर बड़ा खतरा​

सरकारी कार्यालयों में गोपनीयता एक अनिवार्य शर्त होती है। वैयक्तिक सहायक (PA) और गोपनीय दस्तावेजों के रख-रखाव की जिम्मेदारी केवल स्थायी और जवाबदेह सरकारी कर्मचारियों की होती है। आगरा में इस नियम की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं।​

  • आईडी और पासवर्ड का खेल: कई विभागों में सरकारी अधिकारियों के डिजिटल सिग्नेचर और विभागीय पोर्टल के आईडी-पासवर्ड इन आउटसोर्स कर्मचारियों के पास होते हैं। यह न केवल सुरक्षा में सेंध है, बल्कि सरकारी डेटा की निजता का खुला उल्लंघन भी है।​
  • भ्रष्टाचार का ‘ब्रिज’: सालों से एक ही विभाग और एक ही सीट पर जमे रहने के कारण ये कर्मचारी अधिकारियों, ठेकेदारों और बिचौलियों के बीच ‘कमीशन’ के मुख्य सेतु बन गए हैं। इन्हें विभाग की हर कमजोरी और हर ‘चोर रास्ते’ का पता होता है, जिसका फायदा भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में किया जाता है।​
  • स्वास्थ्य विभाग और राजस्व में ‘जुगाड़’ की अघोषित हुकूमत ​:- स्वास्थ्य विभाग और राजस्व कार्यालयों की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। यहाँ जनता का सीधा जुड़ाव सरकार से होता है, लेकिन बीच में ये आउटसोर्सिंग कर्मचारी एक ‘फिल्टर’ की तरह काम करते हैं। यदि कोई फाइल इन कर्मचारियों की मेज से होकर नहीं गुजरती, तो वह महीनों तक ठंडे बस्ते में पड़ी रहती है।​
  • मुख्यमंत्री ने हर कार्यालय में ‘मूवमेंट रजिस्टर’ अनिवार्य किया था ताकि यह पता चल सके कि कौन सी फाइल किस मेज पर कितनी देर रुकी और उसे कौन देख रहा है। लेकिन आगरा के इन विभागों में मूवमेंट रजिस्टर का नियम केवल कागजों तक सीमित है। यहाँ फाइलों की चाल काम की प्राथमिकता से नहीं, बल्कि ‘जुगाड़’ और ‘सेटिंग’ से तय होती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर

संज्ञेय अपराध की श्रेणी में है यह कृत्य, फिर भी चुप्पी क्यों?​

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही चेतावनी दी थी कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी या अधिकारी किसी बाहरी व्यक्ति को अनधिकृत रूप से सरकारी कार्य सौंपता है, तो इसे ‘संज्ञेय अपराध’ माना जाएगा। ऐसे मामलों में दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है।​

इसके बावजूद आगरा में आउटसोर्स कर्मचारी खुद को ‘अघोषित अधिकारी’ समझने लगे हैं। इससे न केवल आम जनता परेशान है, बल्कि विभाग के उन ईमानदार और नियमित कर्मचारियों में भी भारी असंतोष है जो नियमों के दायरे में रहकर काम करना चाहते हैं। बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसके संरक्षण में यह ‘समांतर सरकार’ फल-फूल रही है?​

निष्कर्ष: क्या तंत्र की सफाई कर पाएगा प्रशासन?​आगरा प्रशासन के लिए अब यह आत्ममंथन और कड़ी कार्रवाई का विषय है। क्या वास्तव में इन विभागों में स्थायी कर्मचारियों की इतनी भारी कमी है कि गोपनीय और महत्वपूर्ण कार्य भी बाहरी हाथों में सौंपने पड़ रहे हैं? या फिर यह जानबूझकर भ्रष्टाचार के सिंडिकेट को चलाने के लिए बनाया गया एक सुरक्षित ढांचा है?​

जब तक इन ‘अदृश्य खिलाड़ियों’ को सरकारी पटलों से नहीं हटाया जाता, तब तक ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा ताजनगरी में खोखला ही नजर आएगा। आगरा की जनता को अब उस दिन का इंतजार है जब सरकारी दफ्तरों की फाइलें किसी ‘बिचौलिए’ के बजाय सीधे जवाबदेह अधिकारी के हाथ में होंगी।​

पाठकों से सवाल: क्या आपके शहर या क्षेत्र के सरकारी दफ्तरों में भी आउटसोर्स कर्मचारी ही काम संभाल रहे हैं? अपनी राय और अनुभव कमेंट बॉक्स में साझा करें।

​रिपोर्ट: ब्यूरो, भारत4मीडिया.कॉम