
आगरा। ताजनगरी के नगर निगम सदन में सोमवार को वह नजारा देखने को मिला, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। लोकतंत्र के मंदिर कहे जाने वाले सदन में जनता के प्रतिनिधियों (पार्षदों) और प्रशासन के बीच की खाई इतनी गहरी हो गई कि मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह को अपने ही प्रशासन के खिलाफ ‘विद्रोह’ का झंडा बुलंद करना पड़ा। नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के सदन में न पहुंचने से नाराज मेयर ने कड़े तेवर दिखाते हुए अधिकारियों के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास कर दिया और साफ तौर पर कहा कि ये अधिकारी सरकार की छवि धूमिल कर रहे हैं।
जब खाली कुर्सियों ने बढ़ाया पार्षदों का पारा
सोमवार सुबह 11 बजे, जब मेयर की सूचना पर भाजपा और बसपा के लगभग 80 पार्षद सदन की कार्यवाही के लिए पहुंचे, तो वहां का नजारा देख सब दंग रह गए। सदन में मेयर तो मौजूद थीं, पार्षद भी अपनी सीटों पर थे, लेकिन अधिकारियों वाली दीर्घा पूरी तरह खाली थी। नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल समेत नगर निगम का एक भी कर्मचारी वहां मौजूद नहीं था।
करीब आधे घंटे के इंतजार के बाद जब यह स्पष्ट हो गया कि कोई अधिकारी नहीं आने वाला, तो सदन हंगामे की भेंट चढ़ गया। पार्षदों ने इसे जनप्रतिनिधियों का अपमान करार देते हुए नारेबाजी शुरू कर दी।
नगर आयुक्त के खिलाफ निंदा प्रस्ताव: 72 पार्षदों के हस्ताक्षर
मेयर और नगर आयुक्त के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान इस घटना के बाद चरम पर पहुंच गई है। अधिकारियों की अनुपस्थिति को गंभीरता से लेते हुए मेयर ने सदन में नगर आयुक्त के खिलाफ निंदा प्रस्ताव रखा, जिसे बहुमत के साथ पास कर दिया गया। इस प्रस्ताव पर कुल 72 पार्षदों ने हस्ताक्षर किए हैं।
मेयर हेमलता दिवाकर ने कड़े शब्दों में कहा, “आगरा नगर निगम के इतिहास में यह पहली बार है जब सदन चल रहा हो और एक भी अधिकारी मौजूद न हो। यह अधिकारियों की हठधर्मिता है। वे न केवल जनप्रतिनिधियों का अनादर कर रहे हैं, बल्कि सीधे तौर पर सरकार के विरुद्ध काम कर रहे हैं।”
’ट्रिपल इंजन’ पर विपक्ष का तंज और वॉकआउट
सदन की इस उठापटक के बीच विपक्ष को भी सरकार पर हमला करने का मौका मिल गया। बसपा पार्षदों ने इसे भाजपा की ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार की विफलता बताया। बसपा दल के नेता ने तंज कसते हुए कहा कि जब सत्ता पक्ष की मेयर की ही उनके अधिकारी नहीं सुन रहे, तो शहर के विकास की उम्मीद किससे की जाए? हालांकि, चर्चा के दौरान तीखी नोकझोंक के बाद बसपा पार्षदों ने सदन से वॉकआउट कर दिया, जिससे माहौल और भी तनावपूर्ण हो गया।
नियम और प्रोटोकॉल की कानूनी जंग
दूसरी ओर, अधिकारियों की गैर-मौजूदगी के पीछे प्रशासनिक तर्कों का हवाला दिया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, अधिकारी उस शासनादेश का जिक्र कर रहे हैं जिसमें कहा गया है कि जब विधानसभा या संसद सत्र चल रहा हो, तो नगर निगम का सदन आयोजित नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा, सोमवार को आगरा में उत्तर प्रदेश विधानमंडल की ‘सार्वजनिक उपक्रम एवं निगम संयुक्त समिति’ की महत्वपूर्ण बैठक भी प्रस्तावित थी, जिसमें नगर आयुक्त और अन्य अधिकारियों की उपस्थिति अनिवार्य थी। इन्हीं व्यावहारिक कठिनाइयों को अधिकारियों के न आने का मुख्य कारण बताया जा रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दहलीज तक पहुंचेगी शिकायत
मेयर हेमलता दिवाकर झुकने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले अधिकारियों की शिकायत सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की जाएगी। उन्होंने बताया कि इस पूरे घटनाक्रम से मंडलायुक्त, जिलाधिकारी और प्रमुख सचिव (नगर विकास) को अवगत करा दिया गया है। मेयर का आरोप है कि अधिकारी जानबूझकर विकास कार्यों में रोड़ा अटका रहे हैं और शासन की मंशा के विपरीत काम कर रहे हैं।
निष्कर्ष: क्या रुकेगा आगरा का विकास?
अधिकारियों और मेयर के बीच की यह ‘जंग’ अब व्यक्तिगत न रहकर संस्थागत होती जा रही है। इसका सीधा असर आगरा के विकास कार्यों और जनता की समस्याओं के समाधान पर पड़ रहा है। बिना एजेंडे और बिना अधिकारियों के सदन की कार्यवाही महज एक हंगामेदार बैठक बनकर रह गई। अगर समन्वय की यही कमी बनी रही, तो स्मार्ट सिटी के दावों और हकीकत के बीच का अंतर और बढ़ता जाएगा।
पाठकों के लिए एक सवाल:
आपको क्या लगता है, शहर के विकास के लिए मेयर और नगर आयुक्त के बीच इस टकराव का समाधान क्या होना चाहिए? क्या अधिकारियों की अनुपस्थिति वास्तव में जनप्रतिनिधियों का अपमान है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।



