
आगरा। आगरा नगर निगम में मेयर बनाम नगर आयुक्त की जंग अब उस मोड़ पर पहुँच गई है जहाँ से वापसी का रास्ता नजर नहीं आता। कल तक जो मामला फाइलों और चिट्ठियों में सिमटा था, मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाहा द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सीधी मुलाकात के बाद उसने ‘सियासी तूफान’ का रूप ले लिया है। शहर के गलियारों में अब बस एक ही चर्चा है—क्या आगरा में भी ‘बुलडोजर’ न्याय की तरह प्रशासनिक सर्जरी होगी?
: सीएम की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर टिकी निगाहें
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के बाद मेयर के तेवर और सख्त हो गए हैं। सूत्रों की मानें तो मुख्यमंत्री ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और नगर विकास विभाग से पूरे प्रकरण की गोपनीय रिपोर्ट मांगी है। मेयर का लखनऊ जाकर सीधे गुहार लगाना यह साफ करता है कि उन्हें स्थानीय स्तर पर न्याय की उम्मीद कम थी। अब सवाल यह है कि क्या शासन द्वारा कोई विशेष जांच दल (SIT) गठित की जाएगी या फिर विभागीय ऑडिट से ही काम चलाया जाएगा?
इनसाइड स्टोरी: ‘ऑफलाइन बॉक्स’ बना विवाद की जड़
इस पूरे विवाद के केंद्र में ‘ऑफलाइन बॉक्स प्रणाली’ है। जानकारों का कहना है कि डिजिटल इंडिया के दौर में जब हर काम ई-टेंडरिंग से हो रहा है, तब आगरा नगर निगम में करोड़ों के काम ऑफलाइन होना अपने आप में कई संदेह पैदा करता है।
मेयर का आरोप है कि 10 लाख रुपये की जो लक्ष्मण रेखा (Limit) तय की गई थी, उसका दुरुपयोग हुआ। बड़े कामों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर (Split) चहेते ठेकेदारों को रेवड़ियों की तरह बांटा गया। मेयर ने सीएम को उन 10-10 फाइलों का हवाला दिया है जो एक ही व्यक्ति को आवंटित की गईं। यह सीधे तौर पर ‘मोनोपॉली’ यानी एकाधिकार की ओर इशारा करता है।
नगर आयुक्त का बचाव: “सबकी सहमति से हुए काम”
दूसरी तरफ, नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल डिफेंसिव मोड में हैं। उनका कहना है कि मेयर ने जिन प्रस्तावों पर सवाल उठाए हैं, वे सभी सदन और कार्यकारिणी में सर्वसम्मति से पास हुए थे। प्रशासन का तर्क है कि विकास कार्यों में तेजी लाने के लिए कुछ निर्णय लिए गए। हालांकि, मेयर के इस आरोप का उनके पास ठोस जवाब नहीं है कि बार-बार पत्र लिखने के बावजूद उन्होंने विवरण उपलब्ध क्यों नहीं कराया। इसे ही मेयर ने ‘हठधर्मिता’ और ‘अहंकार’ का नाम दिया है।
आगरा की जनता का क्या?
इस खींचतान के बीच ताजनगरी का आम नागरिक खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है। एक तरफ जलभराव और कूड़े की समस्या है, वहीं दूसरी तरफ शहर के प्रथम नागरिक (मेयर) और प्रशासनिक मुखिया (नगर आयुक्त) के बीच की खाई गहरी होती जा रही है। 9 करोड़ रुपये की यह कथित आर्थिक क्षति वास्तव में आगरा के विकास में लगने वाला पैसा था, जो अब फाइलों और आरोपों के जाल में फंस गया है।
अगला कदम क्या होगा?
शासन की अगली कार्रवाई बहुत कुछ तय करेगी। यदि जांच में मेयर के आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह नगर निगम के इतिहास का सबसे बड़ा प्रशासनिक उलटफेर हो सकता है। फिलहाल, आगरा नगर निगम के गलियारों में सन्नाटा है, लेकिन हर किसी की धड़कनें तेज हैं।
निष्कर्ष:
मेयर और नगर आयुक्त के बीच का यह विवाद अब केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि साख की लड़ाई बन चुका है। भ्रष्टाचार के इन आरोपों ने नगर निगम की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।



