आगरा,: ताजनगरी के नगर निगम में पिछले कुछ दिनों से चल रहा ‘सियासी दंगल’ अब एक नया मोड़ ले चुका है। जहां एक तरफ प्रशासनिक अधिकारी इसे सुरक्षा में चूक और बाहरी तत्वों का हस्तक्षेप बता रहे थे, वहीं अब महापौर (मेयर) ने मोर्चा खोलते हुए इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। मेयर का स्पष्ट कहना है कि जिन लोगों को ‘संदिग्ध’ बताकर उनकी तस्वीरें सार्वजनिक की गईं, वे कोई अपराधी नहीं बल्कि पार्षद प्रतिनिधि, भाजपा कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधियों के सहायक थे।

​नगर निगम की ‘गुप्तचर’ राजनीति और सीसीटीवी का विवाद

​विवाद की जड़ 23 मार्च को हुई सदन की बैठक है। नगर निगम प्रशासन ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर कुछ चेहरों को चिह्नित किया था और उन्हें ‘संदिग्ध बाहरी व्यक्ति’ करार दिया था। गुरुवार को इस मामले ने तब तूल पकड़ लिया जब इन तथाकथित ‘संदिग्धों’ ने खुद मीडिया के सामने आकर अपनी पहचान उजागर की।

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​महापौर ने कड़े शब्दों में कहा कि नगर आयुक्त की यह रणनीति जनप्रतिनिधियों को नीचा दिखाने और उन्हें डराने के लिए बनाई गई है। मेयर के अनुसार, सदन की कार्यवाही में पार्षदों के साथ उनके परिजन, भाई, बेटे या निजी सहायकों का होना एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसे ‘साजिश’ का नाम देना दुर्भाग्यपूर्ण है।

​”हम संदिग्ध नहीं, कार्यकर्ता हैं”: जनप्रतिनिधियों के करीबियों का फूटा गुस्सा

​नगर निगम के गलियारों में गुरुवार को भारी गहमागहमी रही। भाजपा जिला उपाध्यक्ष (अनुसूचित मोर्चा) और महापौर प्रतिनिधि हर्ष दिवाकर ने इसे नगर आयुक्त की सोची-समझी चाल बताया। उन्होंने कहा, “जनप्रतिनिधि अकेले काम नहीं करता, उसके साथ सहयोगियों की एक टीम होती है। उन्हें संदिग्ध बताकर अपमानित करना लोकतंत्र का अपमान है।”

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​इसी क्रम में वार्ड-25 की पार्षद मिथलेश मौर्या के पुत्र गोगा मौर्या और वार्ड-96 की पार्षद के पुत्र अपूर्व शर्मा (सदस्य, यूपी कांग्रेस कमेटी) ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या जनहित के कार्यों के लिए निगम जाना या अपनी मां (पार्षद) का सहयोग करना अपराध की श्रेणी में आता है?

​तहरीर वापसी: बैकफुट पर आया निगम प्रशासन?

​इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब नगर निगम के केयरटेकर और सहायक अभियंता जीवेक ने थाना हरीपर्वत में दी गई अपनी तहरीर वापस ले ली। जीवेक ने थाना प्रभारी को लिखित रूप में सूचित किया कि उन्होंने यह तहरीर ‘उच्च अधिकारियों’ के दबाव में दी थी और अब वे इस मामले में कोई कानूनी कार्रवाई नहीं चाहते।

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​तहरीर की वापसी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नगर निगम के भीतर ही अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच सामंजस्य की भारी कमी है। कर्मचारियों का एक गुट अब खुलकर यह कह रहा है कि उन्हें जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मोहरा बनाया जा रहा है।

​फूट डालो और राज करो की नीति का आरोप

​कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही दलों के जुड़े हुए प्रतिनिधियों ने एक सुर में नगर आयुक्त पर ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाने का आरोप लगाया है। जलकल विभाग कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष अमर डागौर ने भी खुद को संदिग्ध सूची में पाकर आश्चर्य जताया। उन्होंने कहा कि वे वर्षों से जनहित के लिए निगम आ रहे हैं, लेकिन पहली बार उन्हें इस तरह के व्यवहार का सामना करना पड़ा है।

​राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव केवल ‘बाहरी लोगों’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक वर्चस्व और राजनीतिक अधिकारों के बीच की एक लंबी लड़ाई का हिस्सा है।

​निष्कर्ष: क्या खत्म होगा यह गतिरोध?

​आगरा नगर निगम का यह विवाद अब केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसने प्रतिष्ठा की लड़ाई का रूप ले लिया है। तहरीर वापस होने से भले ही कानूनी पेच ढीला पड़ा हो, लेकिन मेयर और नगर आयुक्त के बीच की खाई और चौड़ी हो गई है। ताजनगरी की जनता अब यह देख रही है कि विकास कार्यों के बजाय नगर निगम आपसी कलह का केंद्र बनता जा रहा है।

पाठकों के लिए एक सवाल:

क्या आपको लगता है कि नगर निगम सदन में पार्षदों के प्रतिनिधियों और परिजनों का प्रवेश वैध होना चाहिए, या प्रशासनिक मर्यादा बनाए रखने के लिए इस पर सख्ती जरूरी है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।