आगरा। ताजनगरी में सड़क हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, लेकिन प्रशासन और परिवहन विभाग की नींद अब भी पूरी तरह नहीं खुली है। जिले के प्रभारी और पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह द्वारा अवैध बस स्टैंडों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश देने के महज 72 घंटे के भीतर ही दावों की पोल खुलती नजर आ रही है। सोमवार को शहर के प्रमुख चौराहों का नजारा यह बताने के लिए काफी था कि अफसरों की फाइलों और जमीन की हकीकत में कितना बड़ा फासला है।

मंत्री की समीक्षा बैठक और कड़े निर्देश: क्या था मामला?​

बीते शुक्रवार को आगरा के प्रभारी मंत्री जयवीर सिंह ने विकास कार्यों और कानून व्यवस्था की समीक्षा बैठक की थी। इस बैठक में शहर की बिगड़ती ट्रैफिक व्यवस्था और अवैध बस स्टैंडों से होने वाले जाम पर गहरी चिंता जताई गई थी। मंत्री ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि शहर के भीतर कहीं भी अवैध रूप से बसें खड़ी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि ये अवैध स्टैंड न केवल यातायात को बाधित कर रहे हैं, बल्कि सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण भी बन रहे हैं।​

मंत्री के आदेश के बाद परिवहन विभाग हरकत में आया और आनन-फानन में ‘नो पार्किंग जोन’ की घोषणा की गई। लेकिन सोमवार सुबह की तस्वीरें डराने वाली थीं। सुल्तानगंज की पुलिया, आईएसबीटी के बाहरी हिस्से और भगवान टॉकीज जैसे व्यस्त इलाकों में परिवहन निगम और निजी बसें पहले की तरह ही सवारी भरती नजर आईं।​

खूनी रविवार: जब दो जिंदगियां सड़क पर ही खत्म हो गईं​

प्रशासन की यह लापरवाही तब और भी गंभीर हो जाती है जब हम पिछले आंकड़ों को देखते हैं। अभी रविवार को ही शहर ने एक भीषण मंजर देखा था, जब एक बेकाबू ट्रक और बस ने दो लोगों को बेरहमी से रौंद दिया। हादसे में दोनों की मौके पर ही मौत हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सड़कों के किनारे अवैध रूप से खड़ी बसें और वहां लगने वाला जाम चालकों का ध्यान भटकाता है और संकरी जगह होने के कारण वाहन अनियंत्रित हो जाते हैं। इन म़ौतों के बाद भी परिवहन विभाग का ढुलमुल रवैया जनता के गुस्से को भड़का रहा है।

​’नो पार्किंग जोन’ सिर्फ कागजों तक सीमित?​

उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC), आगरा की ओर से एक आधिकारिक सूचना जारी कर स्पष्ट कहा गया है कि भगवान टॉकीज, अबुलाला दरगाह, वॉटर वर्क्स और रामबाग जैसे क्षेत्रों को ‘नो पार्किंग जोन’ घोषित किया गया है। विभाग ने चालकों और परिचालकों को सख्त चेतावनी दी है कि वे केवल बस स्टेशन से ही सवारी बैठाएं या उतारें।

​हैरानी की बात यह है कि विभाग ने इन स्टैंडों पर नजर रखने के लिए बाकायदा अधिकारियों की ड्यूटी लगा रखी है। इसके बावजूद सोमवार को निजी बस संचालक और रोडवेज के कुछ चालक बेखौफ होकर बीच सड़क पर बसें रोककर सवारियां भरते देखे गए। सवाल यह उठता है कि जब अधिकारी मौके पर तैनात हैं, तो उनकी नाक के नीचे नियमों की धज्जियां कैसे उड़ रही हैं?​

बेलगाम निजी बसें और ‘कमीशन’ का खेल​

आगरा की सड़कों पर सबसे बड़ी चुनौती ये ‘बेलगाम’ निजी बसें बनी हुई हैं। आईएसबीटी के आसपास निजी बस संचालकों का अपना ही एक समानांतर सिस्टम चलता है। परिवहन विभाग के कुछ ‘जांबाज’ अधिकारियों की मुस्तैदी केवल खानापूर्ति तक सीमित है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि निजी बस संचालकों और कुछ निचले स्तर के कर्मचारियों के बीच साठगांठ है, जिसके कारण कार्रवाई के नाम पर केवल छोटे वाहनों का चालान काटकर इतिश्री कर ली जाती है।​

शहर के बीचों-बीच भगवान टॉकीज चौराहा हो या सुल्तानगंज की पुलिया, यहाँ निजी बसों की कतारें सड़क की एक पूरी लेन को घेर लेती हैं। इससे पीछे से आने वाले वाहनों के लिए जगह नहीं बचती और पीक आवर्स में यहाँ घंटों जाम लगा रहता है।​

निष्कर्ष: जिम्मेदारी किसकी?​

आगरा में पर्यटन और विकास की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन बुनियादी सुरक्षा और यातायात प्रबंधन के मोर्चे पर शहर पिछड़ रहा है। मंत्री के आदेश के बाद भी अगर सुधार नहीं हो रहा है, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता है। सड़क पर जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों के लिए ये केवल ‘आंकड़े’ नहीं, बल्कि एक कभी न भरने वाला जख्म है।

क्या प्रशासन किसी और बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है या फिर इस बार वाकई इन अवैध स्टैंडों के खिलाफ कोई निर्णायक कार्रवाई होगी?​

आपकी राय: क्या आपको लगता है कि केवल आदेश देने से आगरा की ट्रैफिक व्यवस्था सुधरेगी, या इसके लिए मौके पर तैनात अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।