आगरा, उत्तर प्रदेश। ताजनगरी आगरा में इस साल होली का रंग कुछ अलग ही अंदाज में चढ़ा। आमतौर पर होली का त्योहार गुझिया की मिठास, रंगों की बौछार और आपसी मिलन के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार आगरा के लोगों ने उत्सव मनाने के लिए ‘जाम’ को प्राथमिकता दी। आंकड़ों की मानें तो इस साल होली के हुड़दंग के बीच शराब की बिक्री ने मिठाई, रंग और गुलाल के साझा कारोबार को भी पीछे छोड़ दिया है।

​बाजार विशेषज्ञों और आबकारी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, आगरा में होली के उपलक्ष्य में मात्र तीन दिनों के भीतर 40 करोड़ रुपये से अधिक की शराब गटक ली गई। यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह बदलते सामाजिक परिवेश और त्योहार मनाने के तरीकों पर भी एक नई बहस छेड़ता है।

​रंगों से ज्यादा ‘बोतलों’ की मांग: आंकड़ों का गणित

​आगरा में होली की खुमारी 1 मार्च से ही दिखाई देने लगी थी। शराब के शौकीनों ने त्योहार पर किसी भी तरह की कमी न रह जाए, इसके लिए पहले से ही स्टॉक करना शुरू कर दिया था। आबकारी विभाग के गोदामों से मिली जानकारी के अनुसार, 1 मार्च को लगभग 21 करोड़ रुपये की शराब की निकासी हुई। वहीं, 2 मार्च को यह सिलसिला जारी रहा और 16 करोड़ रुपये की अंग्रेजी और देसी शराब दुकानों तक पहुँचाई गई।

​3 मार्च की रात 10 बजे तक शहर की लगभग हर शराब दुकान पर लंबी कतारें देखी गईं। आलम यह था कि कई ब्रांड्स का स्टॉक समय से पहले ही खत्म हो गया। स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि उन्होंने पिछले कई सालों में होली पर इतनी भारी भीड़ नहीं देखी थी।

​मिठाई और गुझिया का बाजार पड़ा फीका

​होली का असली स्वाद पारंपरिक तौर पर गुझिया और मिठाइयों से आता है। आगरा के हलवाई इस बार भी पूरी तैयारी में थे। शहर के नामी मिष्ठान भंडारों पर दोपहर होते-होते गुझिया का स्टॉक खत्म हो गया। देसी घी से बनी प्रीमियम गुझिया जहाँ 550 रुपये से लेकर 1,000 रुपये प्रति किलो तक बिकी, वहीं बजट ग्राहकों के लिए रिफाइंड तेल में बनी गुझिया 250 रुपये प्रति किलो के भाव उपलब्ध थी।

​लेकिन जब कारोबार की तुलना की गई, तो मिठाई और रंग-गुलाल का बाजार शराब के आगे बौना साबित हुआ। जहाँ शराब की बिक्री 40 करोड़ रुपये के पार पहुँच गई, वहीं मिठाई, पिचकारी और रंगों का कुल कारोबार लगभग 30 करोड़ रुपये के आसपास सिमट कर रह गया। चांदी और सोने के रंगों (सिल्वर और गोल्डन) की भारी मांग के बावजूद, ‘स्पिरिट’ की मांग सबसे ऊपर रही।

​शाम 5 बजे के बाद दुकानों पर उमड़ा ‘सैलाब’

​प्रशासनिक नियमों के अनुसार, बुधवार को होली के दिन सुबह से शाम 5 बजे तक शराब की दुकानें पूरी तरह बंद रहीं। हुड़दंगियों और शांति व्यवस्था को देखते हुए यह फैसला लिया गया था। लेकिन जैसे ही शाम के 5 बजे और दुकानों के शटर उठे, नजारा देखने लायक था।

​शहर के एमजी रोड, संजय प्लेस और सदर जैसे इलाकों में दुकानों के बाहर अचानक से सैकड़ों की भीड़ जमा हो गई। लोग शाम की पार्टी के लिए बोतलों का इंतजाम करने में जुट गए। यह सिलसिला देर रात तक चलता रहा, जिससे स्पष्ट हो गया कि इस बार आगरा की होली ‘गीली’ से ज्यादा ‘नशीली’ रही।

​आबकारी विभाग और राजस्व में बढ़ोतरी

​शराब की इस रिकॉर्ड तोड़ बिक्री से सरकारी खजाने (राजस्व) को भारी मुनाफा हुआ है। आबकारी विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि होली जैसे त्योहारों पर मांग बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन इस साल की ग्रोथ उम्मीद से कहीं अधिक रही। विभाग ने पहले ही पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित कर लिया था ताकि कालाबाजारी न हो सके। 1 मार्च से 3 मार्च के बीच हुई 40 करोड़ की निकासी इस बात का प्रमाण है कि आगरा में शराब का उपभोग स्तर तेजी से बढ़ रहा है।

​क्या बदल रही है हमारी संस्कृति?

​इस रिपोर्ट का सबसे गंभीर पहलू यह है कि क्या अब त्योहारों का मतलब सिर्फ शराब का सेवन रह गया है? एक तरफ जहाँ लोग 30 करोड़ रुपये रंग और मिठाई पर खर्च कर रहे हैं, वहीं 40 करोड़ रुपये केवल शराब पर खर्च करना समाज के बदलते व्यवहार को दर्शाता है। बड़े बुजुर्गों का मानना है कि होली का पारंपरिक स्वरूप, जिसमें ठंडई और लोक गीतों का महत्व था, अब धीरे-धीरे कमर्शियल पार्टियों और शराब की बोतलों में सिमटता जा रहा है।

निष्कर्ष (Conclusion)

​आगरा में इस साल की होली व्यापारिक दृष्टि से काफी सफल रही है, लेकिन शराब की बिक्री के आंकड़ों ने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। 40 करोड़ का आंकड़ा न केवल राजस्व के लिए बड़ी खबर है, बल्कि यह शहर के सामाजिक ताने-बाने की एक नई तस्वीर भी पेश करता है। जहाँ एक तरफ गुझिया की मिठास थी, वहीं दूसरी तरफ शराब का नशा भारी पड़ गया।

आपकी राय: क्या आपको लगता है कि त्योहारों पर बढ़ती शराब की यह संस्कृति हमारी पारंपरिक खुशियों को प्रभावित कर रही है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।