आगरा। कहते हैं कि वफ़ादारी का दूसरा नाम कुत्ता होता है, लेकिन क्या इंसान भी उस वफ़ादारी का कर्ज उसी शिद्दत से चुका सकता है? उत्तर प्रदेश के आगरा से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने न केवल इंटरनेट पर लोगों का दिल जीत लिया है, बल्कि इंसान और जानवर के बीच के अटूट रिश्ते की एक नई परिभाषा लिखी है। यहाँ एक परिवार ने अपने पालतू कुत्ते की मृत्यु के बाद उसे किसी जानवर की तरह नहीं, बल्कि घर के एक लाडले सदस्य की तरह विदा किया।​

12 साल का साथ और एक अटूट रिश्ता​

आगरा के शाहदरा बगीची निवासी घनश्याम दीक्षित के घर में करीब 12 साल पहले एक नन्हा मेहमान आया था। दिल्ली से लाए गए इस लेब्राडोर नस्ल के कुत्ते का नाम उन्होंने बड़े प्यार से ‘टाइगर‘ रखा था। टाइगर देखते ही देखते दीक्षित परिवार की धड़कन बन गया। वह केवल घर की रखवाली करने वाला एक जानवर नहीं था, बल्कि परिवार के बच्चों का बड़ा भाई और बुजुर्गों का सहारा था। घनश्याम दीक्षित बताते हैं कि टाइगर की मौजूदगी से घर का कोना-कोना चहकता था।​

जब थम गई टाइगर की सांसें: पूरा इलाका हुआ गमगीन

करीब एक महीने पहले टाइगर की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। उम्र के पड़ाव और बीमारी के कारण वह कमजोर होता गया। परिवार ने बेहतरीन इलाज कराया, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। टाइगर की मौत ने दीक्षित परिवार को सदमे में डाल दिया। घर में चूल्हा नहीं जला और हर सदस्य की आँखों में आँसू थे। परिवार ने फैसला किया कि टाइगर ने उन्हें जीवनभर जो प्यार दिया है, उसका कर्ज वे उसे एक सम्मानजनक विदाई देकर चुकाएंगे।​

गंगा किनारे अंतिम संस्कार और मुंडन की रस्म

आमतौर पर पालतू जानवरों की मौत के बाद उन्हें कहीं दफना दिया जाता है, लेकिन दीक्षित परिवार ने हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करने का निर्णय लिया। टाइगर के पार्थिव शरीर को गंगाजी राजघाट ले जाया गया, जहाँ पूरे विधि-विधान के साथ उसका अंतिम संस्कार हुआ। बात यहीं नहीं रुकी; हिंदू परंपराओं के अनुसार, जब परिवार का कोई सगा सदस्य जाता है, तो पुरुष सदस्य मुंडन कराते हैं। टाइगर के प्रति अपने लगाव को दर्शाते हुए परिवार के पुरुषों ने अपना मुंडन भी करवाया।​

आत्मा की शांति के लिए हवन और ‘ब्रह्मभोज’ का आयोजन​

टाइगर की मौत के 13वें दिन आगरा में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने सबको हैरान कर दिया। दीक्षित परिवार ने बकायदा ‘तेरहवीं’ का आयोजन किया। घर में हवन-पूजन हुआ ताकि टाइगर की आत्मा को शांति मिल सके। इसके बाद एक ‘ब्रह्मभोज’ का आयोजन किया गया, जिसमें न केवल सगे-संबंधियों को बल्कि मोहल्ले के लोगों को भी आमंत्रित किया गया। जो भी इस कार्यक्रम में पहुँचा, उसकी आँखें नम थीं। लोगों का कहना था कि उन्होंने आज तक किसी जानवर के लिए इतना सम्मान और प्रेम नहीं देखा।

​”वह हमारे लिए सिर्फ कुत्ता नहीं, हमारा बेटा था”​

भावुक होते हुए घनश्याम दीक्षित कहते हैं, “लोग कहते हैं कि वह एक जानवर था, लेकिन हमारे लिए वह घर का बेटा था। उसने हमें बिना किसी स्वार्थ के प्यार दिया। अगर हम अपने माता-पिता या बच्चों के जाने पर रस्में निभाते हैं, तो टाइगर के लिए क्यों नहीं? वह इसी सम्मान का हकदार था।” मोहल्ले के लोग भी टाइगर की समझदारी और उसके प्रति परिवार के इस समर्पण की सराहना कर रहे हैं।​

: बेजुबानों के प्रति संवेदना की नई मिसाल​

आगरा की यह घटना समाज को एक बड़ा संदेश देती है। आज के दौर में जहाँ इंसान, इंसान का दुश्मन बना हुआ है, वहीं दीक्षित परिवार ने यह साबित कर दिया कि संवेदनाएं और प्रेम किसी प्रजाति की मोहताज नहीं होतीं। बेजुबानों के प्रति यह करुणा ही हमें वास्तविक रूप में ‘इंसान’ बनाती है। टाइगर आज भले ही शारीरिक रूप से मौजूद नहीं है, लेकिन उसकी विदाई की यह कहानी सालों तक पशु प्रेमियों के लिए एक मिसाल बनी रहेगी।​

पाठकों के लिए एक सवाल: – क्या आपको भी लगता है कि पालतू जानवरों को परिवार के सदस्य के बराबर का दर्जा मिलना चाहिए? क्या आपने भी कभी किसी बेजुबान के साथ ऐसा ही लगाव महसूस किया है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।