आगरा। उत्तर प्रदेश के ताजनगरी आगरा से प्यार और समर्थन की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने समाज की पुरानी रूढ़ियों को पीछे छोड़ दिया है। अक्सर विदाई के समय दुल्हन की आंखों में बाबुल का घर छोड़ने का गम होता है और वह एक नए संसार की ओर कदम बढ़ाती है। लेकिन आगरा की अनीशा कुशवाहा के लिए यह विदाई सिर्फ एक घर से दूसरे घर का सफर नहीं, बल्कि अपने सपनों की उड़ान का पहला कदम बन गई।

​शादी के जोड़े में सजी, हाथों में रची मेहंदी और आंखों में भविष्य के सपने लिए अनीशा जब आगरा के विकास भवन पहुंचीं, तो वहां मौजूद हर शख्स दंग रह गया। वजह थी—विदाई के तुरंत बाद आंगनबाड़ी वर्कर पद के लिए उनका इंटरव्यू।

​प्यार, समर्पण और फिर सात फेरों का सफर

​इस कहानी की शुरुआत करीब तीन महीने पहले लाडूखेड़ा ब्लॉक मुख्यालय से हुई थी। यहाँ साइबर कैफे चलाने वाले मनोज कुशवाहा की मुलाकात पास के ही गाँव की रहने वाली अनीशा से हुई। अनीशा किसी काम से मनोज के कैफे पर आई थीं। धीरे-धीरे बातों का सिलसिला शुरू हुआ और दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे।

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दुल्हन अनीशा को इंटरव्यू दिलवाने ले जाता दूल्हा मनोज ।

जब दोनों ने जीवन भर साथ निभाने का फैसला किया, तो उन्होंने अपने परिवारों से बात की। गनीमत रही कि दोनों के परिवारों ने इस रिश्ते को सहर्ष स्वीकार कर लिया। 21 फरवरी को शादी की तारीख तय हुई, लेकिन किस्मत ने एक और परीक्षा अनीशा के सामने रख दी थी।

​शादी का उल्लास और करियर की चुनौती

​शादी से ठीक एक दिन पहले अनीशा को खबर मिली कि रविवार को आंगनबाड़ी वर्कर की पोस्ट के लिए उसका इंटरव्यू है। एक तरफ जीवन का सबसे बड़ा व्यक्तिगत बदलाव (शादी) था, तो दूसरी तरफ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का मौका। अनीशा असमंजस में थीं। उन्होंने मनोज से कहा, “शादी के तुरंत बाद गाँव से शहर पहुंचना नामुमकिन होगा, शायद मुझे यह मौका छोड़ देना चाहिए।”

​यहीं से मनोज कुशवाहा एक साधारण पति से बढ़कर एक सच्चे जीवनसाथी की भूमिका में नजर आए। उन्होंने न केवल अनीशा को प्रोत्साहित किया, बल्कि वादा भी किया कि वह खुद उसे समय पर इंटरव्यू सेंटर लेकर जाएंगे।

​फेरों के बाद सीधे विकास भवन का रुख

​मनोज ने अपने घर वालों को पूरी स्थिति समझाई। उन्होंने आग्रह किया कि शादी की रस्में और फेरे जल्दी पूरे किए जाएं ताकि विदाई के बाद अनीशा अपने करियर की इस परीक्षा में शामिल हो सके। 21 फरवरी की रात सात फेरों के बाद 22 फरवरी की सुबह जैसे ही विदाई हुई, मनोज अपनी दुल्हन को घर ले जाने के बजाय सीधे आगरा जिला मुख्यालय स्थित विकास भवन ले गए।

​वहां का नजारा देखने लायक था। जहाँ अन्य अभ्यर्थी साधारण कपड़ों में थे, वहीं अनीशा लाल जोड़े और जेवरों से लदी हुई थीं। लेकिन उनके चेहरे पर थकान से ज्यादा आत्मविश्वास और अपने पति के प्रति सम्मान की चमक थी।

​”हर कदम पर साथ दूंगा” – दूल्हे ने जीता सबका दिल

​विकास भवन के बाहर इंतजार कर रहे मनोज कुशवाहा ने बड़ी सादगी से कहा, “शादी का मतलब सिर्फ साथ रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सपनों को जीना भी है। अगर अनीशा नौकरी करना चाहती है और समाज की सेवा करना चाहती है, तो मेरा कर्तव्य है कि मैं उसका हाथ थामकर उसे उसकी मंजिल तक ले जाऊं।” मनोज का यह कदम न केवल अनीशा के लिए, बल्कि उन तमाम महिलाओं के लिए एक उम्मीद की किरण है जो शादी के बाद अपने करियर को तिलांजलि दे देती हैं। आगरा की गलियों में आज इस ‘पढ़े-लिखे’ और ‘समझदार’ दूल्हे की चर्चा हर जुबान पर है।

​महिला सशक्तिकरण की जीवंत मिसाल

​अनीशा ने शादी के लिबास में ही इंटरव्यू के पैनल का सामना किया। उन्होंने बताया कि मनोज का यह सहयोग उनके लिए किसी भी गहने या उपहार से बढ़कर है। यह घटना दर्शाती है कि यदि परिवार और जीवनसाथी का सहयोग मिले, तो भारत की बेटियाँ किसी भी परिस्थिति में अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)

​मनोज और अनीशा की यह कहानी हमें सिखाती है कि आधुनिक समाज में शादियों के मायने बदल रहे हैं। अब पति केवल ‘परमेश्वर’ नहीं, बल्कि एक ‘पार्टनर’ की भूमिका निभा रहे हैं। आगरा की यह घटना न केवल सुर्खियाँ बटोर रही है, बल्कि पितृसत्तात्मक सोच पर एक करारा प्रहार भी है।

पाठकों के लिए एक सवाल:- क्या आपको लगता है कि समाज में हर पुरुष को मनोज की तरह अपनी जीवनसाथी के करियर और सपनों को प्राथमिकता देनी चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।