आज के दौर में जहाँ हर युवा का सपना एक बड़ा पैकेज, लग्जरी गाड़ी और विदेश में सेटल होना है, वहीं उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक ऐसी कहानी सामने आई है जो सफलता की पूरी परिभाषा ही बदल देती है। यह कहानी है आकाश श्रीवास्तव (नाम परिवर्तित) की, जो कभी IIT बॉम्बे के गलियारों में ‘गोल्ड मेडलिस्ट’ के रूप में पहचाने जाते थे और आज अपने मोहल्ले में एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते हैं। उनके पास आज भी अलमारी में $2,40,000 (करीब 2.4 करोड़ रुपये) सालाना का ऑफर लेटर रखा है, लेकिन उन्होंने इसे कभी भुनाया नहीं। क्यों? क्योंकि उनके लिए उनके माता-पिता दुनिया की सबसे बड़ी ‘कंपनी’ थे।

मध्यमवर्गीय संघर्ष से IIT के शिखर तक का सफर

​आकाश का जन्म एक बेहद साधारण परिवार में हुआ। पिता रेलवे में क्लर्क थे और माँ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर घर खर्च में हाथ बँटाती थीं। दो कमरों के मकान में टीन की छत के नीचे रहने वाले इस परिवार का बस एक ही सपना था—बेटे को बड़ा आदमी बनाना। पिता ने अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी और पीएफ का पैसा आकाश की पढ़ाई में लगा दिया, यहाँ तक कि माँ ने अपनी चूड़ियाँ तक बेच दीं ताकि बेटा कोटा जाकर कोचिंग कर सके।

​आकाश ने भी निराश नहीं किया। साल 2012 में उन्होंने ऑल इंडिया रैंक 147 हासिल की और IIT बॉम्बे के कंप्यूटर साइंस विभाग में दाखिला लिया। उनकी मेहनत का फल तब मिला जब फाइनल ईयर में सैन फ्रांसिस्को की एक बड़ी स्टार्टअप कंपनी ने उन्हें 2.4 करोड़ रुपये के सालाना पैकेज पर चुना। पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बँटीं, माँ-बाप की आँखों में खुशी के आँसू थे कि अब बेटा सात समंदर पार जाएगा और गरीबी के दिन खत्म हो जाएंगे।

जब करियर और कर्तव्य के बीच छिड़ी जंग

​किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जिस वक्त आकाश अपने वीजा और पासपोर्ट की तैयारी कर रहे थे, अचानक घर पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। पिता को फेफड़ों में संक्रमण और दिल की बीमारी ने घेर लिया, तो वहीं माँ को दूसरे स्टेज का ब्रेस्ट कैंसर डायग्नोस हुआ। एक तरफ अमेरिका की उड़ान थी और दूसरी तरफ अस्पताल के बिस्तर पर जीवन-मौत से जूझते माता-पिता।

​आकाश ने कंपनी से जॉइनिंग टालने या ‘वर्क फ्रॉम होम’ का अनुरोध किया, लेकिन विदेशी कंपनी को तत्काल कर्मचारियों की जरूरत थी। 14 जुलाई की वह रात आकाश के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट थी। अगले दिन वीजा इंटरव्यू था और अगले ही दिन माँ की दूसरी कीमोथेरेपी। अस्पताल में पिता को दवाई का पर्चा उठाने के लिए झुकते हुए संघर्ष करते देख आकाश का दिल पसीज गया। उन्होंने उसी रात फैसला किया—वे अमेरिका नहीं जाएंगे।

1.6 करोड़ की नौकरी छोड़ी और शुरू की ‘किराने की दुकान’

​दोस्तों ने ‘पागल’ कहा, रिश्तेदारों ने ‘करियर खत्म’ होने की चेतावनी दी, लेकिन आकाश अडिग थे। उन्होंने कानपुर में ही 35 हजार की छोटी सी नौकरी की ताकि माँ-बाप के पास रह सकें। लेकिन जब माँ की सर्जरी और पिता के इलाज के चलते पैसे कम पड़ने लगे और नौकरी भी छूट गई, तो उन्होंने एक साहसिक फैसला लिया। उन्होंने अपने घर के नीचे ‘श्रीवास्तव जनरल स्टोर’ नाम से किराने की दुकान खोल ली।

​IIT का गोल्ड मेडलिस्ट अब दाल, चावल और शक्कर बेच रहा था। शुरुआत में शर्म भी आई, लेकिन जब माँ की सेहत में सुधार होने लगा और पिता के चेहरे पर सुकून दिखा, तो वह दुकान आकाश के लिए किसी ‘मल्टीनेशनल कंपनी’ से बड़ी हो गई। दिन में दुकानदारी और रात को फ्रीलांस कोडिंग करके उन्होंने न केवल घर चलाया, बल्कि लाखों का कर्ज भी चुकाया।

जब ‘किराने वाले IITian’ की कहानी पहुँची अमेरिका

​आकाश का हुनर छिपा नहीं रहा। उन्होंने दुकान के साथ-साथ गरीब बच्चों को कोडिंग सिखाना शुरू किया। जब उनके पढ़ाए एक बच्चे ने नेशनल ओलंपियाड जीता, तो मीडिया में खबर आई—”किराने की दुकान चलाने वाले IITian ने तैयार किया हीरा।” यह खबर जब उसी पुरानी कंपनी के सीटीओ तक पहुँची, तो उन्होंने खुद आकाश को मेल किया और उन्हें अपनी कंपनी के ‘एजुकेशन इनिशिएटिव’ का इंडिया हेड नियुक्त किया, वह भी पूरी तरह रिमोट वर्क (घर से काम) के आधार पर।

निष्कर्ष: सफलता पैकेज में नहीं, संतुष्टि में है

​आज आकाश अपनी दुकान पर लैपटॉप लेकर बैठते हैं। एक तरफ कोडिंग चलती है और दूसरी तरफ ग्राहकों को राशन दिया जाता है। उनके पिता अब 68 वर्ष के हो चुके हैं और गर्व से कहते हैं, “मेरा बेटा अमेरिका नहीं गया, लेकिन उसने मेरे हाथ को कभी अकेला नहीं छोड़ा।”

​आकाश की यह कहानी उन युवाओं के लिए एक आईना है जो पैसे की होड़ में अपने बुजुर्ग माता-पिता को अकेला छोड़ देते हैं। यह हमें सिखाती है कि त्याग कभी घाटा नहीं होता, बल्कि अपनों के प्यार में किया गया सबसे बड़ा निवेश होता है।

पाठकों के लिए एक सवाल:

क्या आपको भी लगता है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम करियर के पीछे भागते हुए उन माता-पिता को भूल रहे हैं जिन्होंने हमें चलना सिखाया? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।