
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में कानून का वो इकबाल देखने को मिला है, जिसकी उम्मीद पीड़ित परिवार कर रहा था। महज 5-6 दिन पहले जिस ‘बर्थडे बॉय’ ने अपनी खुशियों के बीच मौत का तांडव रचा था, पुलिस ने उसे मुठभेड़ में ठिकाने लगा दिया है। बुलंदशहर के खुर्जा इलाके में जिम के भीतर भाजपा नेता के परिवार के तीन सदस्यों को गोलियों से भूनने वाला 50 हजार का इनामी बदमाश जीतू सैनी अब मारा जा चुका है। 120 घंटों के भीतर पुलिस ने इस खूनी खेल का पटाक्षेप कर दिया है।
25 अप्रैल की वो खूनी रात: जब जश्न मातम में बदला
घटना की शुरुआत 25 अप्रैल की रात को हुई थी, जब खुर्जा के सुभाष रोड स्थित एक जिम में जीतू सैनी का जन्मदिन मनाया जा रहा था। पार्टी में हंसी-मजाक चल रहा था, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि एक छोटी सी बात तीन जिंदगियां लील जाएगी। बताया जा रहा है कि पार्टी के दौरान आकाश, मनीष और अमरदीप ने जीतू के चेहरे पर केक लगा दिया था।
बस इतनी सी बात जीतू सैनी को नागवार गुजरी। विवाद इतना बढ़ा कि जीतू ने आपा खो दिया और अपनी पिस्टल निकालकर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस गोलीबारी में भाजपा नेता के परिवार से ताल्लुक रखने वाले तीनों युवकों—आकाश, मनीष और अमरदीप की मौके पर ही मौत हो गई।
पुलिस की घेराबंदी और 120 घंटे का ऑपरेशन
ट्रिपल मर्डर की इस सनसनीखेज वारदात के बाद पूरे इलाके में तनाव फैल गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया। लापरवाही बरतने के आरोप में थाना प्रभारी सहित चार पुलिसकर्मियों को तुरंत निलंबित कर दिया गया। मुख्यमंत्री कार्यालय से भी इस मामले पर कड़ी नजर रखी जा रही थी।

पुलिस ने जीतू सैनी पर 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया और उसकी तलाश में स्वाट (SWAT) और एसओजी (SOG) की टीमें लगा दीं। पुलिस का दबाव इतना था कि जीतू के अन्य साथी रिंकू सैनी और भारत सैनी पहले ही मुठभेड़ के बाद पकड़े जा चुके थे, लेकिन मुख्य आरोपी जीतू सैनी पुलिस की पकड़ से दूर भाग रहा था।
सिकंदरपुर रोड पर हुआ अंतिम हिसाब
बुधवार और गुरुवार की दरमियानी रात पुलिस को सूचना मिली कि जीतू सैनी सिकंदरपुर रोड के पास छिपा हुआ है और कहीं भागने की फिराक में है। घेराबंदी के दौरान जब पुलिस ने उसे सरेंडर करने को कहा, तो उसने भागने की कोशिश की और पुलिस टीम पर फायरिंग शुरू कर दी।

इस मुठभेड़ में एसओजी प्रभारी असलम और एक अन्य सिपाही को गोली लगी और वे घायल हो गए। आत्मरक्षा में पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की, जिसमें जीतू सैनी को गोलियां लगीं। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। 120 घंटे पहले जो शख्स अपनी सालगिरह मना रहा था, आज उसका अंत पुलिस की गोलियों से हुआ।
लापरवाही पर गाज और सह-आरोपियों की गिरफ्तारी
इस पूरे मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली दो तरफा दिखी। एक तरफ जहाँ वारदात के तुरंत बाद चार पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर अनुशासन का संदेश दिया गया, वहीं दूसरी ओर अपराधियों की धरपकड़ के लिए आधुनिक तकनीक और मुखबिर तंत्र का इस्तेमाल किया गया।
जीतू के दो साथी, रिंकू और भारत सैनी को पुलिस ने 28-29 अप्रैल की रात ही गिरफ्तार कर लिया था। दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों भी पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने उनके पैरों में गोली मारकर उन्हें दबोच लिया। बरामदगी के समय इन आरोपियों ने पुलिस पर हमला किया था, जो इनके आपराधिक दुस्साहस को दर्शाता है।
निष्कर्ष: क्या अपराध का ऐसा अंत जरूरी है?
बुलंदशहर का यह एनकाउंटर एक बार फिर ‘यूपी मॉडल’ की याद दिलाता है, जहाँ अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी जा रही है। एक मामूली विवाद में तीन परिवारों को तबाह करने वाले अपराधी का अंजाम वही हुआ, जिसकी समाज के एक बड़े वर्ग द्वारा मांग की जा रही थी। हालांकि, पुलिस के लिए चुनौती अब भी बड़ी है क्योंकि हथियारों की आसान उपलब्धता और छोटी बातों पर उग्र होता युवा वर्ग समाज के लिए चिंता का विषय है।
पाठकों के लिए सवाल:
क्या आपको लगता है कि इस तरह के ‘त्वरित न्याय’ (Quick Justice) से अपराधियों के मन में खौफ पैदा होगा और भविष्य में ऐसे अपराधों में कमी आएगी? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।



