हर साल मार्च-अप्रैल आते ही अभिभावकों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं। वजह है—प्राइवेट स्कूलों द्वारा थोपी गई महंगी किताबों की लंबी लिस्ट और उन खास दुकानों के पते, जहाँ से ये किताबें खरीदी जानी अनिवार्य होती हैं। लेकिन अब इस ‘कमीशन’ वाले खेल पर पूरी तरह लगाम लगने वाली है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए साफ कर दिया है कि अब प्राइवेट स्कूलों की मनमानी नहीं चलेगी।

​महंगी किताबों के ‘सिंडिकेट’ पर NHRC का कड़ा प्रहार

​अक्सर देखा जाता है कि प्राइवेट स्कूल जानबूझकर प्राइवेट पब्लिशर्स की ऐसी किताबें पाठ्यक्रम में शामिल करते हैं, जिनकी कीमत NCERT की किताबों की तुलना में 10 गुना तक अधिक होती है। जहाँ NCERT की एक किताब 50-100 रुपये में मिल जाती है, वहीं प्राइवेट पब्लिशर्स की वही किताब 500 से 800 रुपये तक की होती है।

​NHRC की प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने ‘नमो फाउंडेशन’ की शिकायत पर संज्ञान लेते हुए देशभर के सभी राज्यों और शिक्षा मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा के क्षेत्र में ‘अकादमिक भेदभाव’ (Academic Discrimination) बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आयोग का तर्क है कि जब देश का कानून एक है, तो सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के पाठ्यक्रम में इतना भारी अंतर और खर्च क्यों?

​कक्षा 8 तक सिर्फ NCERT: क्या है नया आदेश?

​आयोग ने शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम की धारा 29 का हवाला देते हुए कड़ा रुख अपनाया है। आयोग के निर्देशों के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • अनिवार्य पाठ्यक्रम: कक्षा 8 तक के सभी बच्चों को सिर्फ NCERT या SCERT की किताबें ही पढ़ाई जाएं।
  • प्राइवेट पब्लिशर्स पर लगाम: स्कूल अपनी मर्जी से किसी भी प्राइवेट प्रकाशक की महंगी किताबें छात्रों पर नहीं थोप सकते।
  • 30 दिनों का अल्टीमेटम: सभी राज्य सरकारों और मुख्य सचिवों को 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपनी होगी कि उन्होंने इस आदेश को लागू करने के लिए क्या कदम उठाए हैं।

​बच्चों के कंधे से घटेगा भारी बस्ता: स्कूल बैग पॉलिसी 2020

​सिर्फ महंगी किताबें ही नहीं, बल्कि बच्चों की पीठ पर लदा ‘पहाड़’ जैसा भारी बस्ता भी अब बीते दिनों की बात होने वाली है। NHRC ने ‘नेशनल स्कूल बैग पॉलिसी 2020’ (National School Bag Policy 2020) को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए हैं।

​अध्ययनों में सामने आया है कि भारी बैग के कारण बच्चों में कम उम्र में ही पीठ दर्द और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं हो रही हैं। आयोग ने साफ किया है कि जरूरत से ज्यादा किताबें और वर्कबुक लादने वाले स्कूलों पर अब कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि वे स्कूलों का औचक निरीक्षण (Audit) करें और यह सुनिश्चित करें कि नियमों का उल्लंघन न हो।

​राज्यों से मांगे गए जवाब: प्रशासन की बढ़ी हलचल

​NHRC ने राज्यों के मुख्य सचिवों से तीन प्रमुख सवालों पर जवाब माँगा है:

  1. ​क्या जिला शिक्षा अधिकारियों ने स्कूलों को NCERT किताबें पढ़ाने का स्पष्ट आदेश दिया है?
  2. ​2025-26 के सत्र में एडमिशन लेने वाले छात्रों के लिए किताबों की उपलब्धता की क्या स्थिति है?
  3. ​क्या निजी स्कूलों में चल रहे पाठ्यक्रम का सरकारी मानकों के साथ मिलान किया गया है?

​आयोग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि 30 दिनों के भीतर संतोषजनक रिपोर्ट नहीं मिली, तो संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जाएगा।

​अभिभावकों के लिए बड़ी राहत

​इस फैसले का सबसे अधिक स्वागत अभिभावकों द्वारा किया जा रहा है। दिल्ली-NCR सहित देश के बड़े शहरों में एक बच्चे की किताबों का सेट औसतन 5,000 से 10,000 रुपये के बीच आता है। यदि NCERT लागू होती है, तो यह खर्च घटकर मात्र 500 से 1,000 रुपये रह जाएगा। यह न केवल आर्थिक बोझ को कम करेगा, बल्कि शिक्षा के व्यवसायीकरण पर भी चोट करेगा।

​निष्कर्ष

​NHRC का यह हस्तक्षेप शिक्षा प्रणाली में समानता लाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है। शिक्षा कोई मुनाफा कमाने का व्यापार नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य निर्माण की नींव है। अगर राज्य सरकारें इस आदेश को सही मायने में लागू करती हैं, तो यह न केवल मध्यमवर्गीय परिवारों की जेब बचाएगा, बल्कि बच्चों के बचपन को भी भारी बस्ते के बोझ से मुक्त करेगा।

पाठकों के लिए सवाल:

क्या आपको लगता है कि सिर्फ आदेश देने से प्राइवेट स्कूलों की मनमानी रुक जाएगी, या इसके लिए जमीनी स्तर पर और सख्त निगरानी की जरूरत है? अपनी राय हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।