
उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे जीरो टॉलरेंस अभियान के तहत विजिलेंस विभाग ने एक बड़ी मछली पर शिकंजा कसा है। आगरा नगर निगम के पूर्व प्रभारी अपर नगर आयुक्त दीपक कृष्ण सिन्हा के ठिकानों पर हुई छापेमारी ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। यह कार्रवाई केवल एक अधिकारी के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस भ्रष्ट तंत्र पर कड़ा प्रहार है जो जनता की गाढ़ी कमाई को अपनी सुख-सुविधाओं की भेंट चढ़ा देता है।
आय से 124% अधिक संपत्ति: विलासिता की कोई सीमा नहीं
विजिलेंस आगरा सेक्टर की जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। सेवानिवृत्त पीसीएस अधिकारी दीपक कृष्ण सिन्हा ने अपनी सेवा अवधि के दौरान वैध स्रोतों से लगभग 1.46 करोड़ रुपये की आय अर्जित की थी। लेकिन, जब उनकी संपत्तियों का कच्चा चिट्ठा खुला, तो आंकड़ा 3.28 करोड़ रुपये के पार जा पहुंचा। यानी अपनी घोषित आय से 124 प्रतिशत अधिक की संपत्ति।
जांच में सामने आया है कि सिन्हा ने न केवल आगरा, बल्कि गाजियाबाद, कानपुर और गोरखपुर जैसे शहरों में भी बेनामी और घोषित संपत्तियां बनाईं। गाजियाबाद के राज नगर एक्सटेंशन स्थित उनके आवास की भव्यता देखकर विजिलेंस की टीम भी दंग रह गई। घर के बाथरूम और किचन को सजाने में ही लाखों रुपये खर्च किए गए थे, वहीं ब्रांडेड इलेक्ट्रॉनिक सामान और महंगे इंटीरियर पर पानी की तरह पैसा बहाया गया।
आगरा के पॉश इलाकों में बेहिसाब निवेश
विजिलेंस की टीम ने आगरा के हरीपर्वत स्थित ‘रुबी अपार्टमेंट’ और पदम बिजनेस पार्क में उनके फ्लैट्स पर छापेमारी की। दस्तावेजों के मुताबिक, इन फ्लैट्स की रजिस्ट्री तो कम कीमतों पर दिखाई गई थी, लेकिन वर्तमान बाजार दर के हिसाब से इनकी कीमत करोड़ों में है।
- आगरा: पदम बिजनेस पार्क में 925 वर्गफीट का फ्लैट।
- गाजियाबाद: वैभव खंड, इंदिरापुरम में 90 लाख से अधिक की कीमत का फ्लैट।
- कानपुर: विष्णुपुरी क्षेत्र में बड़ा आवासीय निवेश। इसके अलावा, घर से मिले जेवरात की कीमत ही करीब 56.70 लाख रुपये आंकी गई है। यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी जमा चुकी थीं।
आगरा के सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार का ‘दीमक’
दीपक कृष्ण सिन्हा का मामला तो महज एक बानगी है। हकीकत यह है कि ताजनगरी आगरा के कई सरकारी विभाग भ्रष्टाचार के दीमक की चपेट में हैं। नगर निगम हो, विकास प्राधिकरण (ADA) या फिर राजस्व विभाग—बिना ‘सुविधा शुल्क’ के फाइलों का आगे बढ़ना आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
अक्सर देखा जाता है कि शहर में अवैध निर्माणों को संरक्षण देने के नाम पर मोटी उगाही की जाती है। विभाग के छोटे कर्मचारी से लेकर बड़े अधिकारियों तक की मिलीभगत से सरकारी जमीनों पर कब्जे और टेंडरों में बंदरबांट की खबरें आती रहती हैं। दीपक सिन्हा के कार्यकाल (2012-2017) के दौरान भी कई ऐसे प्रोजेक्ट्स रहे होंगे, जिनकी अगर निष्पक्ष जांच हो, तो कई और सफेदपोश चेहरे बेनकाब हो सकते हैं।
विजिलेंस की लंबी जांच और एफआईआर का शिकंजा
इस कार्रवाई की नींव जनवरी 2022 में पड़ी थी, जब शासन ने खुली जांच के आदेश दिए थे। तीन साल की गहन तफ्तीश के बाद जनवरी 2025 में रिपोर्ट सौंपी गई। संतोषजनक जवाब न मिलने पर 5 जुलाई 2025 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की गई। आगरा सेक्टर की निरीक्षक रेखा चौरसिया इस मामले की विवेचना कर रही हैं। विजिलेंस एसपी आलोक शर्मा के अनुसार, अभी कई बैंक खातों और अन्य बेनामी निवेशों की जांच जारी है, जिससे रिकवरी का आंकड़ा और बढ़ सकता है।
निष्कर्ष: क्या खत्म होगा भ्रष्टाचार का खेल?
एक सरकारी अधिकारी का जनता की सेवा छोड़कर निजी संपत्ति बटोरने में लग जाना लोकतंत्र के लिए घातक है। दीपक कृष्ण सिन्हा पर हुई यह कार्रवाई अन्य भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है। हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या केवल एक अधिकारी को पकड़ने से व्यवस्था सुधर जाएगी? आगरा जैसे महानगर में विभागों के भीतर पनप रहे सिंडिकेट को तोड़ना प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
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