आगरा। किसी भी लोकतांत्रिक देश में न्याय की सार्थकता तब तक सिद्ध नहीं होती, जब तक वह आम आदमी की समझ और उसकी अपनी भाषा में न हो। इसी गंभीर विषय को केंद्र में रखते हुए शुक्रवार, 13 फरवरी 2026 को ऐतिहासिक आगरा कॉलेज के विधि संकाय में एक बौद्धिक विमर्श का आयोजन किया गया। “मातृभाषा में विधि शिक्षा एवं न्याय” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी ने न केवल कानूनी विशेषज्ञों को एक मंच पर लाया, बल्कि न्याय प्रणाली में भाषा के अवरोधों को तोड़ने की एक नई अलख भी जगाई।

​भारतीय भाषा अभियान के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस (पखवाड़ा) के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यक्रम में यह बात प्रमुखता से उभरकर आई कि जब तक अदालतों की भाषा जनसामान्य की भाषा नहीं बनेगी, तब तक न्याय की वास्तविक अनुभूति अधूरी रहेगी।

​न्याय की भाषा और आम आदमी के बीच की दूरी

संगोष्ठी का शुभारंभ विधि संकाय के परिसर में प्रातः 11:30 बजे माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन और वंदना के साथ हुआ। स्वागत उद्बोधन देते हुए प्रोफेसर मोअज्जम खान ने विषय की गंभीरता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “आज भी हमारे देश में अधिकांश कानूनी नजीरें और साहित्य अंग्रेजी में उपलब्ध हैं। एक सामान्य नागरिक अदालत की कार्यवाही में खुद को मूक दर्शक महसूस करता है। समय की मांग है कि विधि शिक्षा और न्यायिक प्रक्रिया को मातृभाषा में सुदृढ़ किया जाए।”​

भारतीय भाषा अभियान: 2012 से बदलाव की एक लहर​

विशिष्ट अतिथि और एडीजीसी (सिविल) श्रीमती अंजलि वर्मा ने अपने संबोधन में भारतीय भाषा अभियान के सफर पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि साल 2012 से शुरू हुआ यह अभियान अब रंग ला रहा है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, जहाँ राजभाषा हिंदी है, अधीनस्थ न्यायालयों में अब अधिकांश आदेश हिंदी में दिए जा रहे हैं।​

उन्होंने अनुच्छेद 348 का संदर्भ देते हुए कहा कि संसद को अब इस दिशा में और अधिक ठोस संशोधन करने चाहिए। श्रीमती वर्मा ने युवाओं और अधिवक्ताओं से एक भावनात्मक अपील भी की कि वे अपने दैनिक कार्यों, हस्ताक्षर, नेम प्लेट और पत्राचार में अपनी मातृभाषा का गर्व से प्रयोग करें।

​”बिना अपनी भाषा के सांस्कृतिक गुलामी से मुक्ति संभव नहीं”

​पूर्व डीजीसी (सिविल) राजेश कुलश्रेष्ठ ने कड़े शब्दों में कहा कि जिस व्यक्ति को अपनी भाषा और देश पर गर्व नहीं, वह अपने सांस्कृतिक मूल्यों से कट जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह चिकित्सा (Medical) के क्षेत्र में अब हिंदी को अपनाया जा रहा है, उसी तरह न्याय के क्षेत्र में भी इसे पूर्ण प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए। जब फैसला हिंदी में होगा, तो मुवक्किल को किसी ‘बिचौलिए’ या अनुवादक की जरूरत नहीं होगी, जिससे शोषण की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।

​मातृभाषा: शिक्षा में आत्मविश्वास का आधार

मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित प्रोफेसर अरविंद मिश्रा (पूर्व ओएसडी, राज्यपाल उत्तर प्रदेश) ने इस बहस को एक नया आयाम दिया। उन्होंने तर्क दिया कि मातृभाषा में शिक्षा केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक मनोवैज्ञानिक और तकनीकी आवश्यकता है।

​”जब एक छात्र अपनी मातृभाषा में कानून पढ़ता है, तो वह अधिक आत्मविश्वास के साथ बहस कर पाता है। न्याय केवल कानूनों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह संवेदनशील संप्रेषण की एक प्रक्रिया है।” – प्रोफेसर अरविंद मिश्रा​

उन्होंने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि इस बदलाव के लिए हमें कानूनी शब्दावली के मानकीकरण और संस्थागत समन्वय पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है।​

जिला न्यायालयों में बढ़ता हिंदी का प्रभाव

मुख्य अतिथि और पूर्व जिला जज श्री गोपाल कुलश्रेष्ठ ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि पूर्व की तुलना में अब जिला न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग काफी बढ़ा है। इससे न्यायिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और जनोन्मुखी हुई है। उन्होंने कहा कि जब बहस स्थानीय भाषा में होती है, तो पक्षकार भी सक्रिय रूप से प्रक्रिया में भाग ले पाता है।​

महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर सी. के. गौतम ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि राष्ट्रभाषा से ही राष्ट्र का सम्मान जुड़ा है। उन्होंने उच्च न्यायालयों में हिंदी में आ रहे निर्णयों को एक सुखद बदलाव बताया।​

आयोजन की झलकियां और आभार​

कार्यक्रम का सफल संचालन विधि छात्रा झील गौतम द्वारा किया गया, जबकि अतिथियों का परिचय संयोजिका प्रोफेसर रीता निगम ने गरिमामय ढंग से कराया। संगोष्ठी के अंत में सभी गणमान्य अतिथियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।​

विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डी. सी. मिश्रा ने सभी आगंतुकों, वरिष्ठ शिक्षकों और छात्र-छात्राओं का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रोफेसर एम. एम. खान, प्रोफेसर उमेश कुमार, डॉ. शिव वीर सिंह सहित भारी संख्या में शिक्षक और छात्र उपस्थित रहे। मीडिया प्रभारी प्रोफेसर गौरव कौशिक ने बताया कि इस तरह के आयोजनों से विधि के छात्रों में अपनी भाषा के प्रति सम्मान और कानूनी समझ दोनों में वृद्धि होती है।