नई दिल्ली/आगरा: भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जहाँ इंसान और जंगली जानवरों के बीच का संघर्ष अक्सर खबरों की सुर्खियाँ बनता है, वहाँ एक संस्था ऐसी भी है जिसने पिछले तीन दशकों से ‘सह-अस्तित्व’ की एक नई इबारत लिखी है। वाइल्डलाइफ एसओएस (Wildlife SOS) ने अपने सफर के 30 साल पूरे कर लिए हैं। यह सफर महज जानवरों को बचाने का नहीं था, बल्कि क्रूरता के खिलाफ करुणा की जीत और विज्ञान आधारित संरक्षण की एक महागाथा है।​

IMG 20260211 WA0010

जमीनी स्तर की एक छोटी सी शुरुआत से लेकर आज भारत भर में 17 अत्याधुनिक रेस्क्यू सेंटर संचालित करने तक, वाइल्डलाइफ एसओएस ने संरक्षण, पुनर्वास और विज्ञान को एक साथ जोड़कर एक ऐसा मॉडल पेश किया है जिसकी सराहना आज पूरी दुनिया में हो रही है।​

डांसिंग’ भालू प्रथा का अंत: एक ऐतिहासिक उपलब्धि​

IMG 20260211 WA0008

वाइल्डलाइफ एसओएस की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक जीतों में से एक थी—भारत की सड़कों पर सदियों से चली आ रही ‘डांसिंग भालू’ की दर्दनाक प्रथा का पूर्ण उन्मूलन। संस्था ने न केवल 600 से अधिक भालुओं को बचाया, बल्कि ‘कलंदर’ समुदाय के हजारों लोगों को वैकल्पिक आजीविका प्रदान कर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा।​

IMG 20260211 WA0007

आज, संस्था आगरा में दुनिया का सबसे बड़ा स्लॉथ भालू बचाव केंद्र संचालित करती है। इसके अलावा बेंगलुरु, भोपाल और पुरुलिया में भी केंद्र स्थापित हैं, जहाँ वर्तमान में 150 से अधिक भालुओं (स्लॉथ भालू, एशियाई ब्लैक भालू और हिमालयन ब्राउन भालू) की देखभाल की जा रही है। यहाँ उन्हें न केवल चिकित्सा सहायता मिलती है, बल्कि उनके व्यवहार और गतिविधियों को समझने के लिए रेडियो कॉलर जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग भी किया जाता है।

​हाथी कल्याण: जंजीरों से आजादी और देश का पहला हाथी अस्पताल​

हाथियों को भारत में ‘विरासत पशु’ का दर्जा प्राप्त है, लेकिन उनकी स्थिति अक्सर चिंताजनक रही है। वाइल्डलाइफ एसओएस ने इस दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाते हुए मथुरा में भारत का पहला हाथी अस्पताल और हाथी देखभाल केंद्र स्थापित किया।

IMG 20260211 WA0013

​संस्था का ‘हाथी सेवा’ मिशन, जो भारत का पहला मोबाइल हाथी क्लिनिक है, उन हाथियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जो दूर-दराज के इलाकों में जख्मी हालत में होते हैं। वहीं, ‘बैगिंग एलीफैंट’ (भीख मांगने वाले हाथी) अभियान के जरिए उन हाथियों को रेस्क्यू किया जाता है जिन्हें सड़कों पर सवारी या जुलूसों के लिए शोषित किया जाता था। आज ये विशालकाय जीव पिंजरों और जंजीरों से मुक्त होकर अपने प्राकृतिक परिवेश के करीब जीवन बिता रहे हैं।​

मानव-वन्यजीव संघर्ष का समाधान और तेंदुओं का संरक्षण​

IMG 20260211 WA0015

महाराष्ट्र में वाइल्डलाइफ एसओएस का मानिकदोह तेंदुआ संरक्षण केंद्र एक मिसाल है। यहाँ 50 से अधिक ऐसे तेंदुओं की देखभाल की जा रही है जो या तो अनाथ हो गए थे या इंसानी बस्तियों के पास संघर्ष का शिकार हुए। संस्था केवल जानवरों को बचाती नहीं है, बल्कि वन विभाग के कर्मचारियों और स्थानीय ग्रामीणों को तकनीकी प्रशिक्षण और जागरूकता देकर भविष्य के संघर्षों को रोकने का काम भी करती है।​

संस्था का मानना है कि जब तक स्थानीय समुदाय वन्यजीवों के साथ सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे, तब तक संरक्षण का लक्ष्य अधूरा है।​

रक्षकों की नई पीढ़ी: सामुदायिक सशक्तिकरण

वाइल्डलाइफ एसओएस की सह-संस्थापक और सचिव, गीता शेषमणि कहती हैं, “संरक्षण केवल जानवरों को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन पर निर्भर जीवन को बचाने से भी जुड़ा है।” संस्था का ट्राइबल पुनर्वास कार्यक्रम इसका जीता-जागता उदाहरण है। कलंदर समुदाय के पूर्व शिकारियों को आज रक्षक बनाया जा चुका है। उनकी महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देकर संस्था ने एक सामाजिक बदलाव की नींव रखी है।

IMG 20260211 WA0009

​सह-संस्थापक और सीईओ, कार्तिक सत्यनारायण के अनुसार, “पिछले 30 वर्षों ने हमें सिखाया है कि सफलता संरक्षण के हर पहलू को एकीकृत करने में है। हमें गर्व है कि एक छोटा सा प्रयास आज भविष्य की पहलों के लिए एक वैश्विक आदर्श बन गया है।

“​पर्यावरण बहाली: केवल जानवर नहीं, जंगल भी बचाना है

संस्था अब केवल प्राणियों तक सीमित नहीं है। ‘रामदुर्गा वैली इकोलॉजिकल रिस्टोरेशन’ और ‘रीवाइल्ड फॉर वाइल्डलाइफ’ जैसी परियोजनाओं के माध्यम से खराब हो चुके परिदृश्यों को पुनर्जीवित किया जा रहा है। देशी पेड़ लगाकर और जंगलों को दोबारा हरा-भरा कर वाइल्डलाइफ एसओएस यह सुनिश्चित कर रही है कि आने वाली पीढ़ियों के पास प्रकृति और वन्यजीवों के लिए पर्याप्त स्थान हो।

​वन विभागों के साथ मिलकर किए गए इन कार्यों पर डायरेक्टर कंज़रवेशन प्रोजेक्ट्स, बैजूराज एम.वी. कहते हैं कि यह साझेदारी ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है, जिसने नीतियों में बदलाव लाने और वन्यजीव कल्याण को मजबूत करने में मदद की है।​

निष्कर्ष​ :- वाइल्डलाइफ एसओएस के 30 साल यह साबित करते हैं कि यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मानवीय संवेदना के साथ मिला दिया जाए, तो बड़े से बड़े संकट का समाधान संभव है। भारत के जंगलों की दहाड़ और हाथियों की चिंघाड़ को सुरक्षित रखने में इस संस्था का योगदान अतुलनीय है।